Monday, 9 October 2017

विलक्षणता: विष्णु मंदिर का रक्षक मगरमच्छ

      हिंसक जीव-जन्तु यदि अपना मूल स्वभाव छोड़ दें तो शायद अद्भुत या ईश्वरी चमत्कार ही कहा जाएगा। 'मगरमच्छ" मांसाहार का त्याग कर दे या यंू कहें कि शाकाहार जीवन जीने लगे तो शायद आश्चर्य होगा। यह कोई किवदंती नहीं है बल्कि हकीकत है। 

    जी हां, दक्षिण भारत के राज्य केरल के अनन्तपुर में यह विलक्षणता देखने को मिल रही है। अनन्तपुर के अनन्त पद्मनाभ स्वामी मंदिर की रक्षा-सुरक्षा एक मगरमच्छ करता है। यह मगरमच्छ हिंसक न होकर शांत स्वभाव से झील में विचरण करता रहता है। 
    अनन्त पद्मनाभ स्वामी मंदिर झील पर बना है। मंदिर के आसपास झील का जल हिचकोले लेते रहता है। श्रद्धा व आस्था का यह केन्द्र मनोरम व लुभावना भी है। मुख्यत: यह मंदिर भगवान विष्णु जी का है।
      इसे अनन्त पद्मनाभ स्वामी मंदिर या भगवान विष्णु मंदिर अथवा बबिया मंदिर के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि इस मंदिर क्षेत्र की रक्षा-सुरक्षा बबिया नाम का यह शाकाहारी मगरमच्छ करता है। मंदिर के पुजारी इसे अपने हाथों से भगवान का भोग अर्थात प्रसाद खिलाते हैं। बस इसी प्रसाद से मगरमच्छ का पेट भरता है।
     मंदिर प्रबंधन व पुजारियों के अलावा किसी को भी इस मगरमच्छ को कुछ भी खिलाने की अनुमति नहीं होती। विशेष बात यह भी है कि बारिश कम हो या अधिक इस झील का जल स्तर समान ही रहता है। न कम न अधिक। बताते हैं कि भगवान विष्णु जी के इस मंदिर परिसर की इस झील में मगरमच्छ सौ वर्षों से अधिक समय से रह रहा है। 
     इस मगरमच्छ से झील के अन्य जीव-जन्तुओं को भी कोई खतरा या नुकसान नहीं रहता। श्रद्धालुओं की मानें तो वर्ष 1945 में एक अग्रेंज सैनिक को झील में तैरता मगरमच्छ दिखा तो उसने गोली मार दी। गोली लगने से मगरमच्छ की मौत हो गई लेकिन बाशिंदों को आश्चर्य हुआ कि अगले दिन वह मगरमच्छ जिंदा तैरता दिखा। बताते हैं कि कुछ दिन बाद गोली मारने वाले सैनिक की सर्पदंश से मौत हो गई।
      इसे सांपों के देवता अनन्त का बदला माना गया। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मंदिर की इस झील में मगरमच्छ के दर्शन हो जाएं तो भाग्यशाली होंगे। प्रबंधन की मानें तो मगरमच्छ ईश्वर का दूत है। जब कभी भी मंदिर या उसके आसपास कुछ भी अनिष्ट होने की आंशका होती है तो मगरमच्छ से संकेत मिल जाते हैं किन्तु मगरमच्छ के रहते कोई अनिष्ट नहीं हो पाता।
      मान्यता है कि झील में एक मगरमच्छ की मौत होती है तो रहस्यमयी ढंग से दूसरा मगरमच्छ स्वत: प्रकृट हो जाता है। खास बात यह है कि इस मंदिर की देव प्रतिमाएं पत्थर अथवा धातुओं की नहीं हैं बल्कि सत्तर से अधिक आैषधीय सामग्री से प्रतिमाएं सृजित हैं।
     इन प्रतिमाओं को 'कादु शर्करा योगं" के नाम से जाना जाता है। प्रबंधन की मानें तो वर्ष 1972 में इन प्रतिमाओं को पंचलौह धातु की प्रतिमाओं में बदला गया था लेकिन इसके मूल स्वरुप को बरकरार रखने को ध्यान में रख कर पुन: 'कादु शर्करा योगं" में परिवर्तित कर दिया गया। 
     यह मंदिर तिरुअनन्तपुरम के अनन्त पद्मनाभ स्वामी का मूल स्थान बताया जाता है। बाशिंदों का विश्वास है कि भगवान यहीं आकर स्थापित हुए थे। मंदिर के दर-ओ-दीवार आकर्षक चित्र श्रंखला से अलंकृत हैं। मंदिर परिसर में एक गुफा भी है। 
     इस गुफा का मुख एक ऐसे तालाब की ओर खुलता है, जहां का जल मौसम से प्रभावित नहीं होता। हमेशा एक समान रहता है। विशिष्टताओं से परिपूरित इस मंदिर में दर्शन व अलौलिक छटा के दिग्दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का अनवरत आना जाना लगा रहता है।

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