Wednesday, 11 October 2017

मान्यता-परम्परा : हवा में लटकते शव

'परम्पराओं एवं मान्यताओं" का कहीं कोई अंत नहीं। जी हां, देश-दुनिया में अजीब-ओ-गरीब मान्यतायें एवं परम्परायें देखने-सुनने को मिलती हैं।

    अभी तक हैंगिंग टेम्पल, हैंगिंग फ्लाईओवर-ओवरब्रिाज, हैंगिंग रेस्ट्रां, हैंगिंग हाउस, हैंगिंग गार्डन आदि-अनादि सुुुना होगा लेकिन हैंगिंग कॉफिन नहीं सुना होगा लेकिन दुनिया में यह भी परम्परा है कि ताबुत (कॉफिन) को पहाड़ की चोटी पर लटकाया जाये। 
   आम तौर पर शव का अंतिम संस्कार करने से लेकर जमीन या कब्रिस्तान में दफन करने की व्यवस्थायें-परम्परायें देखते सुनते आये हैं लेकिन शव को ताबुुत में रख कर हवा में लटकाना नहीं सुना होगा। दुनिया के कई देशों में समुदायों के बीच परम्परा है कि शव को ताबुत में रख कर पहाड़ पर लटका दिया जाये। बताते हैं कि दुनिया में यह परम्परा करीब दो हजार वर्ष पुरानी है।
      मान्यता है कि पहाड़ों पर शव रखने से मृत व्यक्ति का अस्तित्व आसानी से प्रकृति की आबोहवा में मिल जाता है। हैंगिंग कॉफिन्स की परम्परा खास तौर से दुनिया के तीन देशों में देखने-सुनने को मिलती है। चीन, इण्डोनेशिया एवं फिलीपींस में यह परम्परा लम्बे समय से चली आ रही है।
     फिलीपींस के सगाधा में यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। चीन में यांगटजी नदी के किनारे हैंगिंग काफिंस देखने को मिल जाते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो यह ताबुत मिंग राजवंश काल के हैं। किसी समय इस स्थान पर कॉफिन्स एक हजार से भी अधिक थे लेकिन अभी धीरे-धीरे यह संख्या काफी कम हो गयी है। 
    हालांकि अब इन कॉफिन्स को संरक्षित कर दिया गया है। इस स्थान को अब पर्यटन स्थलों की भांति मान्यता दी गई है। चीन के ताबुत बेहद खतरनाक तौर-तरीके पर दिखते हैं। आश्चर्य होता है कि आखिर ताबुत को इन खतरनाक स्थल पर कैसे रखा गया ? फिलीपींस में तो कुछ अलग ही परम्परा है।
       फिलीपींस के बुजुर्ग मृत्यु से पहले ताबुत को खुद तैयार करते-कराते हैं। परिजनों को अपनी भावनाओं से अवगत करा देते हैं कि उनकी इच्छा के मुताबिक शव को ताबुत में रख कर हवा में लटकायें। जिससे उनके शरीर का अस्तित्व प्रकृति की गोद में समविष्ट हो जायें। 
    मृत्यु के पश्चात शव को उसमें रख कर पहाडी गुफा में रख दिया जाता है। इण्डोनेशिया के सुलावेसी में भी इस तरह की मान्यतायें एवं परम्परायें मिलती हैं। इसी तरह की मान्यतायें परम्परायें दुनिया के कई देशों में देखने-सुनने को मिलती हैं।

Tuesday, 10 October 2017

चूहों वाला मंदिर करणी मां का दरबार

    'चूहों की धमाचौकड़ी" के बीच 'आस्था का सैलाब" दिखे तो शायद आश्चर्यचकित हो जाएंगे। जी हां, चूहों की संख्या भी एक दो या सौ पचास नहीं बल्कि बीस हजार से अधिक चूहों की फौज। हो जाएंगे न आश्चर्यचकित।

   राजस्थान के बीकानेर से करीब तीस किलोमीटर दूर यह तीरथधाम है। जोधपुर रोड स्थित गांव देशनोक की सीमा पर यह विख्यात मंदिर है। इस मंदिर को मां करणी देवी के मंदिर के नाम से जाना जाता है। बताते हैं कि मां करणी देवी साक्षात जगदम्बा का अवतार थीं। मां करणी देवी के आशीर्वाद से ही बीकानेर व जोधपुर राज्य की स्थापना हुई थी।
  इस मंदिर परिसर में एक भव्य-दिव्य गुफा भी है। मां करणी देवी इसी गुफा में अपने इष्टदेव की पूजा-अर्चना किया करती थीं। आस्था के इस स्थान का इतिहास करीब साढ़े छह सौ वर्ष पुराना है। हिन्दु धर्मावलम्बियों के बीच इस स्थान को तीरथधाम के तौर पर देखा जाता है।
     देश-दुनिया में इसे 'चूहों वाला मंदिर" या 'मूषक मंदिर" के नाम से जाना जाता है। मां के दर्शन के लिए देश दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। संगमरमर के पत्थरों से बने इस मंदिर की भव्यता-दिव्यता देखते ही बनती है। चांदी के किवाड़, सोने के छत्र व चूहों के प्रसाद के लिए चांदी का थाल खास हैं। मंदिर के दर-ओ-दीवार पर अंकित एवं उत्कीर्ण नक्कासी भी मन को लुभाती है। 
    चैत्र व शारदीय नवरात्र में मेलों का विशेष आयोजन होता है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही चूहों की फौज से आमना-सामना होना लाजिमी है। 
  चूहों की धमाचौकड़ी देख कर सहज ही इनकी संख्या यह बहुतायत का अनुमान लगाया जा सकता है। कमोबेश श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश बहुत संभल कर करना होता है क्योंकि चूहों की उछलकूद अत्यधिक होती है। चूहों की इस फौज से श्रद्धालुओं का न कोई नुकसान होता है आैर न ही कोई अन्य क्षति ही होती है। 
    यदि किसी दर्शनार्थी या श्रद्धालु को श्वेत अथवा सफेद चूहे के दर्शन हो जाएं तो अति उत्तम या शुभ माना जाता है। सुबह पांच बजे मंगला आरती व सांझ सात बजे आरती के समय तो चूहों का जुलूस देखने लायक होता है। मंदिर से असंख्य चमत्कारी घटनाएं जुड़ी हैं। 
    श्रद्धालुओं की मनौती पूरी होती है। ऐसी श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है। देश का शायद यह पहला मंदिर है, जहां बीस हजार से अधिक चूहों की फौज निवास करती है। खास बात यह है कि चूहों का जूठा प्रसाद ही भक्तों, श्रद्धाओं व अनुयायियों को वितरित किया जाता है। 
     आश्चर्य ही है कि इतनी बड़ी तादाद में चूहों के होने के बावजूद मंदिर परिसर में कहीं भी बदबू नहीं आती। बताते हैं कि करणी माता बीकानेर राजघराने की कुलदेवी भी हैं। करणी माता के इस मंदिर का दिव्य-भव्य निर्माण बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में कराया था।

Monday, 9 October 2017

विलक्षणता: विष्णु मंदिर का रक्षक मगरमच्छ

      हिंसक जीव-जन्तु यदि अपना मूल स्वभाव छोड़ दें तो शायद अद्भुत या ईश्वरी चमत्कार ही कहा जाएगा। 'मगरमच्छ" मांसाहार का त्याग कर दे या यंू कहें कि शाकाहार जीवन जीने लगे तो शायद आश्चर्य होगा। यह कोई किवदंती नहीं है बल्कि हकीकत है। 

    जी हां, दक्षिण भारत के राज्य केरल के अनन्तपुर में यह विलक्षणता देखने को मिल रही है। अनन्तपुर के अनन्त पद्मनाभ स्वामी मंदिर की रक्षा-सुरक्षा एक मगरमच्छ करता है। यह मगरमच्छ हिंसक न होकर शांत स्वभाव से झील में विचरण करता रहता है। 
    अनन्त पद्मनाभ स्वामी मंदिर झील पर बना है। मंदिर के आसपास झील का जल हिचकोले लेते रहता है। श्रद्धा व आस्था का यह केन्द्र मनोरम व लुभावना भी है। मुख्यत: यह मंदिर भगवान विष्णु जी का है।
      इसे अनन्त पद्मनाभ स्वामी मंदिर या भगवान विष्णु मंदिर अथवा बबिया मंदिर के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि इस मंदिर क्षेत्र की रक्षा-सुरक्षा बबिया नाम का यह शाकाहारी मगरमच्छ करता है। मंदिर के पुजारी इसे अपने हाथों से भगवान का भोग अर्थात प्रसाद खिलाते हैं। बस इसी प्रसाद से मगरमच्छ का पेट भरता है।
     मंदिर प्रबंधन व पुजारियों के अलावा किसी को भी इस मगरमच्छ को कुछ भी खिलाने की अनुमति नहीं होती। विशेष बात यह भी है कि बारिश कम हो या अधिक इस झील का जल स्तर समान ही रहता है। न कम न अधिक। बताते हैं कि भगवान विष्णु जी के इस मंदिर परिसर की इस झील में मगरमच्छ सौ वर्षों से अधिक समय से रह रहा है। 
     इस मगरमच्छ से झील के अन्य जीव-जन्तुओं को भी कोई खतरा या नुकसान नहीं रहता। श्रद्धालुओं की मानें तो वर्ष 1945 में एक अग्रेंज सैनिक को झील में तैरता मगरमच्छ दिखा तो उसने गोली मार दी। गोली लगने से मगरमच्छ की मौत हो गई लेकिन बाशिंदों को आश्चर्य हुआ कि अगले दिन वह मगरमच्छ जिंदा तैरता दिखा। बताते हैं कि कुछ दिन बाद गोली मारने वाले सैनिक की सर्पदंश से मौत हो गई।
      इसे सांपों के देवता अनन्त का बदला माना गया। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मंदिर की इस झील में मगरमच्छ के दर्शन हो जाएं तो भाग्यशाली होंगे। प्रबंधन की मानें तो मगरमच्छ ईश्वर का दूत है। जब कभी भी मंदिर या उसके आसपास कुछ भी अनिष्ट होने की आंशका होती है तो मगरमच्छ से संकेत मिल जाते हैं किन्तु मगरमच्छ के रहते कोई अनिष्ट नहीं हो पाता।
      मान्यता है कि झील में एक मगरमच्छ की मौत होती है तो रहस्यमयी ढंग से दूसरा मगरमच्छ स्वत: प्रकृट हो जाता है। खास बात यह है कि इस मंदिर की देव प्रतिमाएं पत्थर अथवा धातुओं की नहीं हैं बल्कि सत्तर से अधिक आैषधीय सामग्री से प्रतिमाएं सृजित हैं।
     इन प्रतिमाओं को 'कादु शर्करा योगं" के नाम से जाना जाता है। प्रबंधन की मानें तो वर्ष 1972 में इन प्रतिमाओं को पंचलौह धातु की प्रतिमाओं में बदला गया था लेकिन इसके मूल स्वरुप को बरकरार रखने को ध्यान में रख कर पुन: 'कादु शर्करा योगं" में परिवर्तित कर दिया गया। 
     यह मंदिर तिरुअनन्तपुरम के अनन्त पद्मनाभ स्वामी का मूल स्थान बताया जाता है। बाशिंदों का विश्वास है कि भगवान यहीं आकर स्थापित हुए थे। मंदिर के दर-ओ-दीवार आकर्षक चित्र श्रंखला से अलंकृत हैं। मंदिर परिसर में एक गुफा भी है। 
     इस गुफा का मुख एक ऐसे तालाब की ओर खुलता है, जहां का जल मौसम से प्रभावित नहीं होता। हमेशा एक समान रहता है। विशिष्टताओं से परिपूरित इस मंदिर में दर्शन व अलौलिक छटा के दिग्दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का अनवरत आना जाना लगा रहता है।

Sunday, 8 October 2017

दुनिया की बेहतरीन रोमांचक गुफा क्रुबेरा

     खण्डहर में भी सौन्दर्य ! जी हां, सामान्यत: खण्डहर को नैराश्य से अभिभूत रेखांकित किया जाता है। आश्चर्य ही होगा कि नैराश्य में भी सौन्दर्य का लालित्य आकर्षित करे। 

    देश-दुनिया में प्राकृतिक सौन्दर्य से लबरेज गिरि-कंदराओं, गुफाओं, घाटियों व खण्डहरों की एक लम्बी श्रंखला है। जार्जिया के अबखाजिया स्थित क्रुबेरा गुफा को दुनिया की सबसे लम्बी व आकर्षक गुफा का दर्जा हासिल है। 
  दुनिया की सबसे लम्बी व खूबसूरत गुफा का दर्जा हासिल करने वाली क्रुबेरा गुफा को वैज्ञानिकों ने करीब पचपन साल पहले 1960 में खोजा था। जार्जिया के पश्चिमी काकेशस में गाग्रा में स्थित है।
      इसे अब अबखाजिया के नाम से जाना जाता है। प्रवेश द्वार से गुफा करीब 2197 मीटर अर्थात 7208 फुट गहराई वाली है। विशेषज्ञों की मानें तो इसे 2001 में दुनिया की सबसे अधिक गहरी व लम्बाई वाली गुफा का दर्जा हासिल हुआ। 
     इस गुफा का यूक्रेन स्पेलियोलोजिकल एसोसियेशन के विशेषज्ञों ने विधिवत अध्ययन किया। यूक्रेनी गोताखोर जिनेडी स्मोखिन ने इस विशालतम गुफा में एक अति सुन्दर ड्राइविंग टर्मिनल बनाया। करीब 13.432 वर्ग किलोमीटर दायरे वाली इस गुफा में प्राकृतिक सौन्दर्य निहारते ही बनता है। इस गुफा के अन्दर सौन्दर्य की एक अलग ही दुनिया दिखती है।
      इस विशालतम गुफा में रोशनी के कोई इंतजाम न होने के बावजूद कोना-कोना प्राकृतिक प्रकाश से जगमग रहता है। गुफा का एक एक कण अपने सौन्दर्य से दर्शकों एवं पर्यटकों को आकर्षित करता व लुभाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे किसी शिल्पकार ने बड़े ही सलीके से गुफा का कोना-कोना गढ़ा हो लेकिन यह गुफा दुनिया को प्रकृति का सुन्दर व बेहतरीन उपहार है। जिसे देखने के लिए दुनिया से बड़ी संख्या में दर्शक एवं पर्यटक आते हैं।
      चूना पत्थर के शिलाखण्ड पर आधारित इस गुफा में रोमांच की कोई सीमा नहीं है। जलाशय में जल निर्मलता का सौन्दर्य अभिभूत कर देता है तो वहीं प्रकाश पुंज का आलोक स्वप्नलोक अथवा स्वर्ग का एहसास कराता है। गुफा का दुर्गम मार्ग होने के बावजूद सैलानियों का तांता लगा रहता है। 
      खास तौर से पर्यटक व खिलाडियों का जमावड़ा रहता है लेकिन हर किसी को गुफा में प्रवेश की इजाजत नहीं मिलती। स्थानीय प्रशासन की इजाजत के बाद ही गुफा में प्रवेश की इजाजत मिलती है। सौन्दर्य से लबरेज इस गुफा को वोरोन्या गुफा के नाम से भी जाना जाता है।
      जार्जिया के ब्लैक महासागर की अरेबिक मासिक पहाड़ी पर यह विशालतम गुफा स्थित है। गुफा में प्रवेश करना अत्यंत रोमांचक महसूस होता है। गुफा में प्रवेश करने के करीब 1300 मीटर के बाद गुफा कई हिस्सों में विभक्त हो जाती है। जिसे जिस दिशा में जाना हो, यह खुद तय करना होता है।
       इसे कौओं की गुफा के तौर पर भी देखा जाता है क्योंकि इस सुन्दर गुफा में कौओं के असंख्य घोसले देखने को मिल जाएंगे। हालांकि इन कौओं से दर्शक, पर्यटक व खिलाड़ियों को कोई दिक्कत या परेशानी नहीं होती।

Thursday, 5 October 2017

ब्लू होल : मनोरंजकता में भी खतरा

    'सौन्दर्य शास्त्र" का कथ्यात्मक तथ्यात्मक आलोक निश्चय ही किसी को भी लुभाने में समर्थ कहा जाएगा। प्राकृतिक सौन्दर्य जहां एक ओर मन-मस्तिष्क को प्रफुल्लित करता है तो वहीं इसमें खतरे भी कम नहीं। 

   लाल सागर मिरुा तट पर प्राकृतिक सौन्दर्य का नायाब स्थल है। इस स्थल को ब्लू होल के नाम से दुनिया में जाना-पहचाना जाता है। गोताखोर समुदाय का यह एक अति पसंदीदा स्थल है लेकिन ब्लू होल गोताखोरों के लिए बेहद खतरनाक भी माना जाता है। देश दुनिया के तमाम पर्यटक इस स्थल पर गोतोखोरी देखने जाते हैं।
     इसे 'दुनिया के सबसे खतरनाक गोता स्थल" व 'गोताखोर के कब्रिस्तान" के तौर भी जाना जाता है। करीब सौ मीटर गहराई वाले इस ब्लू होल में करीब तीस मीटर लम्बी सुरंग भी है। 
     हालांकि इसका प्रवेश स्थल करीब छह मीटर चौडा़ई वाला है। सुरंग को कट्टर के रुप में जाना जाता है। इस इलाके में मंूगा व चट्टानी मछली की उपलब्धता बहुतायत में है। मिरुा शासन ने इस स्थल पर खास तौर से गाइड्स व प्रशिक्षित कर्मचारी तैनात किए हैं जिससे किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना को रोका जा सके।
     हालांकि मनोरंजक ड्राइविंंग के लिए बड़ी तादाद में गोताखोर यहां आते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अति गहराई में नाइट्रोजन रसायन का प्रभाव मिलता है। नाइट्रोजन का प्रभाव गोताखोरों के लिए बेहद खतरनाक होता है क्योंकि इससे गोताखोरों में शराब का नशा जैसा होने लगता है। 
     नशा का प्रभाव शरीर में होते ही गोताखोरों का फिर बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में गोताखोर की मौत हो जाती है। ब्लू होल बेहद आकर्षक अर्थात मेहराब जैसा काफी कुछ प्रतीत होता है। ब्लू होल की गहराई में धीरे-धीरे गैसों के मिश्रित प्रभाव से गोताखोर को नींद आने लगती है।
     बस गोताखोरों की मौत के यही कारण होते हैं। हालांकि शासकीय गाइड्स निश्चित सीमा से अधिक आगे जाने के इजाजत नहीं देते हैं। फिर भी गोताखोर जोश व मनोरंजकता में निश्चित दायरे से कहीं आगे बढ़ जाते हैं। जिससे हादसे हो जाते है।
      मिरुा के शासकीय अफसरों की मानें तो अब तक सौ से अधिक गोताखोर मौत का शिकार हो चुके हैं। मौतों को देख कर मिरुा शासन ने एहतिहाती उपाय किए हैं। ऐसा नहीं कि इस क्षेत्र में जीवाश्म (जीव-जन्तु) भी बड़ी तादाद में पाए जाते हैं। मगरमच्छ व कछुओं की तादाद कहीं अधिक होती है। इस क्षेत्र में रसायनिक पदार्थों की उपलब्धता भी पर्याप्त मात्रा में है। खास बात यह है कि ब्लू होल का जल कहीं मीठा तो कहीं खारा है।

Wednesday, 4 October 2017

दुनिया का नायाब अमेरिका का गोल्डन गेट ब्रिज

     वास्तुकला की बात हो या नक्कासी या फिर विकास की फर्राटा दौड़ हो... दुनिया में नायाब आयाम गढ़ने में कोई देश किसी से पीछे नहीं। 

  नदियों व नहरों पर झूला पुलों की देश-दुनिया में एक लम्बी श्रंखला है लेकिन अमेरिका का गोल्डन गेट ब्रिज (सेतु) अपनी विलक्षणताओं के कारण दुनिया में अपनी एक अलग ही पहचान रखता है। कुल करीब 2737 मीटर लम्बाई वाला यह झूला पुल अब अपनी आयु के करीब अस्सी वर्ष पूर्ण करने वाला है। 
      इस झूला पुल का विधिवत उद्घाटन 27 मई 1937 को हुआ था। यह झूला पुल अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को को कई इलाकों व मुख्य महामार्गों से जोड़ता है। सैन फ्रांसिस्को खाड़ी के दोनों किनारों को जोड़ता है। विशेषज्ञों की मानें तो निर्माणकाल में इस झूला पुल को दुनिया का सबसे लम्बा झूला पुल माना गया था।
       यह अमेरिका के एक सौ एक महामार्गों को जोड़ता है। सिक्स लेन की चौड़ाई वाले इस पुल पर एक साथ सैकड़ों वाहन फर्राटा भरते हैं। करीब नब्बे फुट इस पुल की चौड़ाई है। जबकि ऊंचाई 227 मीटर से भी अधिक है। इसके निर्माण में लाखों टन लौह का विभिन्न तौर तरीके से इस्तेमाल किया गया। 
      डिजाइन भी अद्भूत है। सैन फ्रांसिस्को, कैलीफोर्निया व मैरीन काउंटी सहित कई क्षेत्रों के लिए यह विशेष विकास का आयाम है। सांझ ढ़लते ही गोल्डन गेट ब्रिज व आसपास का इलाका रोशनी की चकाचौंध से जगमगा उठता है। सैन फ्रांसिस्को एवं कैलिफोर्निया के लिए यह एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न बन चुका है। सांझ होने के साथ ही खाड़ी का जल भी उछाल मारता है। 
      कई बार तो खाड़ी का जल-पानी उछाल मार कर पुल तक भी पहंुच जाता है लेकिन यह जल क्रीड़ा भी यात्रियों-राहगीरों व पर्यटकों को आंनदित करती है। हालांकि सामान्य जल स्तर से इस पुल की ऊंचाई अर्थात नीचे का हिस्सा करीब 67 मीटर ऊंचा है। पुल के नीचे से जल यातायात भी निरन्तर चलता रहता है। 
     झूला पुल पर चकाचौंध रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था है। डिजाइन ऐसा है कि खाड़ी की जलक्रीड़ा का लाइटिंग सिस्टम पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात जनजीवन को कोई खतरा नहीं रहता। दुनिया के इस विशालतम झूला पुल की कल्पना-परिकल्पना सस्पेंशन, ट्रस आर्क एवं टअस काजवेज ने की थी। 
     इस पुल के अनुरक्षण का कार्य गोल्डन गेट ब्रिज हाईवे एण्ड ट्रांसपोर्ट के हवाले है। यह विकास का एक आयाम भर ही नहीं बल्कि एक पर्यटन स्थल भी है। देश-दुनिया से बड़ी संख्या में पर्यटक इस पुल का सौन्दर्य निहारने आते हैं।

Tuesday, 3 October 2017

चीन की गुफा में बसता झॉन्डॉन्ग गांव

    अत्याधुनिक युग में कहीं कोई गिरि कंदराओं व गुफाओं में जीवनयापन की बात करे तो शायद एकबारगी बेमानी सी लगेगी। 

    प्राचीनकाल में भले ही गुफाओं में जीवन दिखता हो लेकिन अत्याधुनिक काल में कोई भी गुफाओं में निवास करना या रहना पसंद नहीं करेगा। खास तौर से चीन जैसे विकसित राष्ट्र में तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती। जी हां, चीन में एक पूरा गांव एक गुफा में बसता है।
  हालांकि चीन की शासकीय व्यवस्थाओं ने आधुनिकता व सभ्यता की दुहाई देकर बाशिंदों को गुफा के इस गांव से बाहर निकालने की कोशिश भी की लेकिन बाशिंदों ने गांव को छोड़ने से साफ इंकार कर दिया। चीन के गुइझोऊ प्रांत के एक हिम शिखर पर झॉन्डॉन्ग गांव बसता है।
   इस गांव में एक सैकड़ा से अधिक परिवार बसते हैं। समुद्र तल से इस गांव की ऊंचाई 1800 मीटर से अधिक है। विशाल गुफा में बसे इस गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर खेलकूद के बड़े मैदान तक सभी कुछ उपलब्ध है। चीन का यह गांव भले ही अत्याधुनिक न हो लेकिन आवश्यकता की सभी जरुरतें गांव में ही पूरी होती है।
     हालांकि चीन की शासकीय व्यवस्थाओं को गुफा का यह गांव कतई नहीं भा रहा है। शायद इसी को ध्यान में रख कर चीन की शासकीय व्यवस्थाओं को देखने वाले अफसरों ने इस गुफा के स्कूल को 2008 में बंद कर दिया। तर्क यह रहा कि यह स्कूल चीन की सभ्यताओं के अनुरुप नहीं है।
   बाशिंदों ने व्यवस्थाओं के सामने झुकने से इंकार कर दिया। कोई विरोध नहीं कोई प्रदर्शन नहीं। अन्तोगत्वा 2011 में स्कूल पुन: चालूू हो गया। स्कूल में नित्य दो घंटे शिक्षा दी जाती है। स्कूल में छात्र कोई टाटपट्टी पर बैठ कर पढ़ाई नहीं करते बल्कि बाकायदा कुर्सी व बेंच की व्यवस्था है। 
     ब्लैक बोर्ड भी है तो रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था भी है। छात्र व शिक्षक दोनो ही इस गुफा के गांव के ही होते हैं। गांव में बाशिंदों की खोज के आधार पर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य व्यवस्थाएं भी चलती हैं तो पीने के पानी सहित सभी जरुरतें गांव में ही पूरी होती हैं।
      हालांकि यह गांव गुफा में काफी ऊंचाई पर है। खरीदारी करने के लिए गांव के बाशिंदों को बाजार जाना पड़ता है। बाजार इस गांव से करीब पन्द्रह किलोमीटर दूूर है। गांव के बाशिंदे चाहते हैं कि चीन की शासकीय व्यवस्थाओं के तहत गांव का विकास हो लेकिन सिस्टम की लाचारी है कि चाहते हुए भी गुफा के अंदर विकास नहीं कर पा रहे हैं। 
      इन सब के बावजूद इस गुफा के बाशिंदे खुश हैं। बताते हैं कि गुफा का यह गांव सदियों से यूं ही चला आ रहा है। गांव के बाशिंदे अपनी सभी आवश्यकताओं का इंतजाम खुद ही करते हैं। इसके लिए वह किसी सहायता पर निर्भर नहीं रहते।

टियाटिहुआकन : पिरामिड श्रंखला का शहर     'रहस्य एवं रोमांच" की देश-दुनिया में कहीं कोई कमी नहीं। 'रहस्य" की अनसुलझी गु...