Thursday, 9 November 2017

मान्यता-परम्परा : हवा में लटकते शव

   'परम्पराओं एवं मान्यताओं" का कहीं कोई अंत नहीं। जी हां, देश-दुनिया में अजीब-ओ-गरीब मान्यतायें एवं परम्परायें देखने-सुनने को मिलती हैं।

  अभी तक हैंगिंग टेम्पल, हैंगिंग फ्लाईओवर-ओवरब्रिाज, हैंगिंग रेस्ट्रां, हैंगिंग हाउस, हैंगिंग गार्डन आदि-अनादि सुुुना होगा लेकिन हैंगिंग कॉफिन नहीं सुना होगा लेकिन दुनिया में यह भी परम्परा है कि ताबुत (कॉफिन) को पहाड़ की चोटी पर लटकाया जाये।
    आम तौर पर शव का अंतिम संस्कार करने से लेकर जमीन या कब्रिस्तान में दफन करने की व्यवस्थायें-परम्परायें देखते सुनते आये हैं लेकिन शव को ताबुुत में रख कर हवा में लटकाना नहीं सुना होगा। 
     दुनिया के कई देशों में समुदायों के बीच परम्परा है कि शव को ताबुत में रख कर पहाड़ पर लटका दिया जाये। बताते हैं कि दुनिया में यह परम्परा करीब दो हजार वर्ष पुरानी है। मान्यता है कि पहाड़ों पर शव रखने से मृत व्यक्ति का अस्तित्व आसानी से प्रकृति की आबोहवा में मिल जाता है।
    हैंगिंग कॉफिन्स की परम्परा खास तौर से दुनिया के तीन देशों में देखने-सुनने को मिलती है। चीन, इण्डोनेशिया एवं फिलीपींस में यह परम्परा लम्बे समय से चली आ रही है। फिलीपींस के सगाधा में यह परम्परा सदियों से चली आ रही है।
     चीन में यांगटजी नदी के किनारे हैंगिंग काफिंस देखने को मिल जाते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो यह ताबुत मिंग राजवंश काल के हैं। किसी समय इस स्थान पर कॉफिन्स एक हजार से भी अधिक थे लेकिन अभी धीरे-धीरे यह संख्या काफी कम हो गयी है।
    हालांकि अब इन कॉफिन्स को संरक्षित कर दिया गया है। इस स्थान को अब पर्यटन स्थलों की भांति मान्यता दी गई है। चीन के ताबुत बेहद खतरनाक तौर-तरीके पर दिखते हैं। आश्चर्य होता है कि आखिर ताबुत को इन खतरनाक स्थल पर कैसे रखा गया ? फिलीपींस में तो कुछ अलग ही परम्परा है। 
  फिलीपींस के बुजुर्ग मृत्यु से पहले ताबुत को खुद तैयार करते-कराते हैं। परिजनों को अपनी भावनाओं से अवगत करा देते हैं कि उनकी इच्छा के मुताबिक शव को ताबुत में रख कर हवा में लटकायें। जिससे उनके शरीर का अस्तित्व प्रकृति की गोद में समविष्ट हो जायें।
    मृत्यु के पश्चात शव को उसमें रख कर पहाडी गुफा में रख दिया जाता है। इण्डोनेशिया के सुलावेसी में भी इस तरह की मान्यतायें एवं परम्परायें मिलती हैं। इसी तरह की मान्यतायें परम्परायें दुनिया के कई देशों में देखने-सुनने को मिलती हैं।

Wednesday, 8 November 2017

ब्लू होल : मनोरंजकता में भी खतरा

  'सौन्दर्य शास्त्र" का कथ्यात्मक तथ्यात्मक आलोक निश्चय ही किसी को भी लुभाने में समर्थ कहा जाएगा। प्राकृतिक सौन्दर्य जहां एक ओर मन-मस्तिष्क को प्रफुल्लित करता है तो वहीं इसमें खतरे भी कम नहीं। लाल सागर मिरुा तट पर प्राकृतिक सौन्दर्य का नायाब स्थल है। 

 इस स्थल को ब्लू होल के नाम से दुनिया में जाना-पहचाना जाता है। गोताखोर समुदाय का यह एक अति पसंदीदा स्थल है लेकिन ब्लू होल गोताखोरों के लिए बेहद खतरनाक भी माना जाता है।
  देश दुनिया के तमाम पर्यटक इस स्थल पर गोतोखोरी देखने जाते हैं। इसे 'दुनिया के सबसे खतरनाक गोता स्थल" व 'गोताखोर के कब्रिास्तान" के तौर भी जाना जाता है। 
   करीब सौ मीटर गहराई वाले इस ब्लू होल में करीब तीस मीटर लम्बी सुरंग भी है। हालांकि इसका प्रवेश स्थल करीब छह मीटर चौडा़ई वाला है। सुरंग को कट्टर के रुप में जाना जाता है। 
    इस इलाके में मंूगा व चट्टानी मछली की उपलब्धता बहुतायत में है। मिरुा शासन ने इस स्थल पर खास तौर से गाइड्स व प्रशिक्षित कर्मचारी तैनात किए हैं जिससे किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना को रोका जा सके। हालांकि मनोरंजक ड्राइविंंग के लिए बड़ी तादाद में गोताखोर यहां आते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अति गहराई में नाइट्रोजन रसायन का प्रभाव मिलता है।
      नाइट्रोजन का प्रभाव गोताखोरों के लिए बेहद खतरनाक होता है क्योंकि इससे गोताखोरों में शराब का नशा जैसा होने लगता है। नशा का प्रभाव शरीर में होते ही गोताखोरों का फिर बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में गोताखोर की मौत हो जाती है।
     ब्लू होल बेहद आकर्षक अर्थात मेहराब जैसा काफी कुछ प्रतीत होता है। ब्लू होल की गहराई में धीरे-धीरे गैसों के मिश्रित प्रभाव से गोताखोर को नींद आने लगती है। बस गोताखोरों की मौत के यही कारण होते हैं। हालांकि शासकीय गाइड्स निश्चित सीमा से अधिक आगे जाने के इजाजत नहीं देते हैं।
      फिर भी गोताखोर जोश व मनोरंजकता में निश्चित दायरे से कहीं आगे बढ़ जाते हैं। जिससे हादसे हो जाते है। मिरुा के शासकीय अफसरों की मानें तो अब तक सौ से अधिक गोताखोर मौत का शिकार हो चुके हैं। मौतों को देख कर मिरुा शासन ने एहतिहाती उपाय किए हैं।
    ऐसा नहीं कि इस क्षेत्र में जीवाश्म (जीव-जन्तु) भी बड़ी तादाद में पाए जाते हैं। मगरमच्छ व कछुओं की तादाद कहीं अधिक होती है। इस क्षेत्र में रसायनिक पदार्थों की उपलब्धता भी पर्याप्त मात्रा में है। खास बात यह है कि ब्लू होल का जल कहीं मीठा तो कहीं खारा है।

Friday, 3 November 2017

विलक्षण रीड बांसुरी गुफा

    'प्राकृतिक उपहार श्रंखला" से देश दुनिया लबरेज है। यह प्राकृतिक श्रंखला दर्शकों एवं पर्यटकों को अपनी विलक्षणता से न केवल आकर्षित करती है बल्कि मन-मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ देती है। जिससे दर्शक एवं पर्यटक लम्बे समय तक भूल नहीं पाते।

   चीन के गुइलिन में एक विलक्षण गुफा है। इस बहुरंगी गुफा का अवलोकन करने या देखने देश दुनिया के दर्शक या पर्यटक बड़ी संख्या आते-जाते रहते हैं। देश दुनिया के पर्यटकों के आकर्षण के इस केन्द्र को रीड बांसुरी गुफा (रीड फ्लूट केव) के नाम से जाना जाता है। 
  यह दिलचस्प गुफा बहुरंगी प्रकाश से हमेशा आलोकित रहती है। इसके लिए प्रकाश की कहीं कोई अतिरिक्त व्यवस्था नहीं है बल्कि शिला खण्ड अर्थात पत्थर श्रंखला की चमक से गुफा आलोकित रहती है। गुफा में अनवरत बहुरंगी-इन्द्रधनुषी प्रकाश की किरणें परिवेश में तैरती रहती हैं।
    इस गुफा में लाइमस्टोन (चूना पत्थर) की एक लम्बी श्रंखला है। खास बात यह है कि इन पत्थर श्रंखला से निकलने वाला प्रकाश विभिन्न रंगों वाला होता है। इतना ही नहीं गुफा में मधुरता व सुरीलापन का भी एहसास होता है कि जैसे गुफा में बांसुरी की मधुर तान-मधुर राग की अठखेलियां हो रही हों। करीब पांच सौ मीटर से अधिक लम्बी यह गुफा अपने अंदर अनेक आकर्षण छिपाये है।
     विशेषज्ञों की मानें तो यह विलक्षण गुफा एक हजार दो सौ वर्ष से भी अधिक पुरानी है। गुफा में शिला खण्ड की विलक्षण व अद्भूत आकृतियां भी अवलोकित होती हैं। यह कलाकृतियां कलात्मकता से परिपूरित हैं। इसमें रॉक संरचनाओं की विशिष्टता दिखती है। इनमें सत्तर से अधिक शिलालेख शामिल हैं। जिसमें चीन के तांग राजवंश का उल्लेख मिलता है। 
    विशेषज्ञों की मानें तो यह प्राचीन शिलालेख गुइलिन की विशिष्टताओं को भी दृश्यांकित करते हैं। यह विलक्षण एवं अदभूत गुफा करीब पौन सौ वर्ष पहले सन 1940 में प्रकाश में आयी। बताते हैं कि कभी जापानी सैनिकों के समूह ने इस स्थान पर शरण ली थी।
     इसके बाद धीरे-धीरे यह गुफा देश दुनिया में दर्शकों एवं पर्यटकों के बीच आकर्षण का केन्द्र बन गयी। चीन के शीर्ष पर्यटन स्थलों में रीड बांसुरी गुफा को जाना जाता है।

Thursday, 2 November 2017

दुनिया का नायाब अमेरिका का गोल्डन गेट ब्रिज

     वास्तुकला की बात हो या नक्कासी या फिर विकास की फर्राटा दौड़ हो... दुनिया में नायाब आयाम गढ़ने में कोई देश किसी से पीछे नहीं। 

 नदियों व नहरों पर झूला पुलों की देश-दुनिया में एक लम्बी श्रंखला है लेकिन अमेरिका का गोल्डन गेट ब्रिज (सेतु) अपनी विलक्षणताओं के कारण दुनिया में अपनी एक अलग ही पहचान रखता है। 
    कुल करीब 2737 मीटर लम्बाई वाला यह झूला पुल अब अपनी आयु के करीब अस्सी वर्ष पूर्ण करने वाला है। इस झूला पुल का विधिवत उद्घाटन 27 मई 1937 को हुआ था। यह झूला पुल अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को को कई इलाकों व मुख्य महामार्गों से जोड़ता है। सैन फ्रांसिस्को खाड़ी के दोनों किनारों को जोड़ता है।
     विशेषज्ञों की मानें तो निर्माणकाल में इस झूला पुल को दुनिया का सबसे लम्बा झूला पुल माना गया था। यह अमेरिका के एक सौ एक महामार्गों को जोड़ता है। सिक्स लेन की चौड़ाई वाले इस पुल पर एक साथ सैकड़ों वाहन फर्राटा भरते हैं। करीब नब्बे फुट इस पुल की चौड़ाई है। 
     जबकि ऊंचाई 227 मीटर से भी अधिक है। इसके निर्माण में लाखों टन लौह का विभिन्न तौर तरीके से इस्तेमाल किया गया। डिजाइन भी अद्भूत है। सैन फ्रांसिस्को, कैलीफोर्निया व मैरीन काउंटी सहित कई क्षेत्रों के लिए यह विशेष विकास का आयाम है।
   सांझ ढ़लते ही गोल्डन गेट ब्रिाज व आसपास का इलाका रोशनी की चकाचौंध से जगमगा उठता है। सैन फ्रांसिस्को एवं कैलिफोर्निया के लिए यह एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न बन चुका है। सांझ होने के साथ ही खाड़ी का जल भी उछाल मारता है। 
   कई बार तो खाड़ी का जल-पानी उछाल मार कर पुल तक भी पहंुच जाता है लेकिन यह जल क्रीड़ा भी यात्रियों-राहगीरों व पर्यटकों को आंनदित करती है। हालांकि सामान्य जल स्तर से इस पुल की ऊंचाई अर्थात नीचे का हिस्सा करीब 67 मीटर ऊंचा है। 
   पुल के नीचे से जल यातायात भी निरन्तर चलता रहता है। झूला पुल पर चकाचौंध रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था है। डिजाइन ऐसा है कि खाड़ी की जलक्रीड़ा का लाइटिंग सिस्टम पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात जनजीवन को कोई खतरा नहीं रहता।
  दुनिया के इस विशालतम झूला पुल की कल्पना-परिकल्पना सस्पेंशन, ट्रस आर्क एवं टअस काजवेज ने की थी।
  इस पुल के अनुरक्षण का कार्य गोल्डन गेट ब्रिाज हाईवे एण्ड ट्रांसपोर्ट के हवाले है। यह विकास का एक आयाम भर ही नहीं बल्कि एक पर्यटन स्थल भी है। देश-दुनिया से बड़ी संख्या में पर्यटक इस पुल का सौन्दर्य निहारने आते हैं।

Friday, 27 October 2017

रेसट्रैक प्लाया : प्राकृतिक सौन्दर्य पर बेहद खतरनाक

  सामान्यत: प्रकृति की गोद में सौन्दर्य का बोध होता है लेकिन दुनिया के असंख्य स्थल इस मिथक या भ्रम को तोड़ते दिखते हैं।

    जी हां, अमेरिका रेसट्रैक प्लाया दुनिया का सबसे खतरनाक स्थान माना जाता है। सामान्यत: इसे दुनिया में डेथ वैली के तौर पर पहचाना-जाना जाता है। 
   दुनिया के सबसे गर्म स्थानों में शुमार होने वाले 'रेसट्रैक प्लाया" में कहीं कोई जन-जीवन नहीं है। 'रेसट्रैक प्लाया" तो छोडिए आसपास भी कहीं कोई जनजीवन नहीं दिखता। यहां कहीं कुछ यदि चलायमान है तो 'पत्थर" । 
   जी हां, सौन्दर्य बोध से परिपूरित 'रेसट्रैक प्लाया" में पत्थर स्वत: चलायमान होते हैं। रेसट्रैक प्लाया डेथ वैली में मौजूद पत्थर श्रंखलाओं को कभी एकल तो कभी समूह में चलते देखा व महसूस किया जा सकता है। यह दशा-दिशा अचरज-अजूबा या आश्चर्य से कम नहीं लेकिन यह हकीकत है। अमेरिका का रेसट्रैक प्लाया डेथ वैली देश-दुनिया में चर्चा एवं कौतुहल का विषय बना हुआ है।
   यह डेथ वैली अमेरिका का एक अतिविशालतम रेगिस्तान है। यह पूर्वी कैलिफोर्निया इलाके में आता है। यह मोजावे रेगिस्तान का हिस्सा है। उत्तरी अमेरिका के सबसे निचले शुष्क एवं गरम स्थानों में से एक है। समुद्र तल से करीब 282 फुट नीचे आंकलित यह इलाका अपनी विशिष्टताओं के कारण ख्याति रखता है। विशेषज्ञों की मानें तो डेथ वैली पश्चिमी गोलार्ध में सर्वाधिक तापमान का रिकार्ड रखता है। 
  खास यह है कि पत्थर श्रंखला तापमान के दबाव एवं रसायनिक कारणों से स्वयं कम्पित एवं चलायमान होती है। कई बार यह पत्थर श्रंखला या एकल पत्थर हमलों की मुद्रा में आ जाते हैं। ऐसा तापमान के दबाव एवं रसायनिक कारणों से होता है।
     ऐसे में बचाव करना असंभव हो जाता है। लाजिमी है कि पत्थरों के हमलों से जान जोखिम में पड़ जाती है। कैलिफोर्निया एवं नेवादा की सीमा वाले इलाके में स्थित यह डेथ वैली अपने आगोश में प्रकृति का सौन्दर्य में समेटे है।
    इस डेथ वैली को अमेरिका में नेशनल पार्क का दर्जा भी हासिल है। पूर्व दिशा में अमार्गोसा रेंज है तो पश्चिम में पैनामिंट रेंज है। सिल्वानिया एवं आउल्सहेड की पर्वत श्रंखला भी उत्तर एवं दक्षिण सीमाओं पर है। करीब 7800 वर्ग किलोमीटर के दायरे वाले इस खतरनाक डेथ वैली को देश-दुनिया के बाशिंदे नजदीक से देखने की इच्छा रखते है लेकिन खतरों को भांप कर दूर ही रहना मुनासिब समझते हैं। 
     विशेषज्ञों की मानें तो डेथ वैली में पत्थरों की शक्ल में 'सॉल्ट पैन्स" फैले हुये हैं। डेथ वैली में यह 'सॉल्ट पैन्स" रसायनिक एवं प्राकृतिक देन है। भूवैज्ञानिकों की मानें तो यहां कभी झीलों का इलाका था लेकिन समुद्री झीलों का यह इलाका धीरे-धीरे सूखता गया। काफी लम्बे समय में यह रेगिस्तान में तब्दील हो गया।

Thursday, 26 October 2017

शिजुओ के गौतम बुद्ध : विश्व के विशालतम

   शिजुओ की पहाड़ी पर 'आश्चर्य" की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। 'आश्चर्यजनक किन्तु सत्य" जी हां, चाइना की शिजुओ की पहाड़ी अपनी खूबियों के लिए देश-दुनिया में विख्यात है।

   इन खूबियों व आश्चर्यजनक कलाकृतियों में भगवान गौतम बुद्ध की विशाल प्रतिमा विद्यमान है। विशेषज्ञों की मानें तो 'लेशान के विशालकाय बुद्ध" दुनिया के विलक्षण बुद्ध हैं। चाइना के लेशान की पहाड़ियों में पत्थर पर उत्कीर्ण भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिमा करीब 71 मीटर अर्थात 233 फुट ऊंची है। 
     इस विशालकाय प्रतिमा को आठवीं शताब्दी में तैयार किया गया था। प्रतिमा की बनावट ऐसी है, जैसे प्रतिमा तीन नदियों को निहार रही हो। इसका चेहरा माउंट एमेई की तरफ है।
     माउंट एमेई बौद्ध धर्मावावलम्बियों का अति पवित्र धार्मिक स्थल है। निर्माण के समय इस स्थान पर तेरह मंजिला लकड़ियों का एक ताकतवर स्ट्रक्चर बनाया गया था। यहां सोने का मढ़ाव भी है। युआन राजवंश के शासनकाल में मंगोल आक्रमणकारियों ने इसे नष्ट कर दिया था। 
     लेशान की यह विशाल प्रतिमा आसन में विद्यमान है। चेहरे पर सौम्यता तो शारीरिक बलिष्ठता परिलक्षित होती है। यह तीन नदियों के संगम स्थल पर विद्यमान है। यह तीन नदियां मिन नदी, क्वीनगई नदी व दादू नदी हैं। संगम का यह स्थान चाइना के लेशान शहर में है। यह सिचुआन प्रांत के पूर्व में है। 
     देश दुनिया के प्राकृतिक सौन्दर्य वाले स्थानों में जाना जाता है। वर्ष 1996 के दिसम्बर में यूनेस्को ने भगवान गौतम बुद्ध के इस स्थान को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया है। विशेषज्ञों की मानें तो इस प्रतिमा का निर्माण 90 वर्ष से भी अधिक समय में पूर्ण हो सका। निर्माण में असंख्य कारीगरों ने सहयोग किया था। 
    दुनिया की यह सबसे बड़ी बुद्ध प्रतिमा के तौर पर पहचान रखती है। खास यह है कि पत्थर पर खुदाई से संरचित इस प्रतिमा के साथ ही स्थल पर बौद्ध धर्म की कविता, गीत व कहानी भी चित्रित हैं। यह अति शांतिपूर्ण स्थल है। यह प्रतिमा 233 फुट ऊंची है तो ऊंगलियां लगभग 27 फुट की हैं। कंधों की चौड़ाई 24 मीटर अर्थात 79 फुट है। 
    विशेषज्ञों की मानें तो इस धार्मिक एवं कलात्मक परियोजना की शुरुआत एक साधु हाई टॉग ने की थी। साधु ने भावनाओं के अनुरूप इस स्थल का चयन प्रतिमा के लिए किया तो पूरी शिद्दत से निर्माण भी पूर्ण हुआ। साधु ने परियोजना का कार्य प्रारम्भ कराया लेकिन पूूर्ण नहीं करा सका लेकिन बाद में साधु हाई टॉग के शिष्य श्रंखला ने इस परियोजना को पूर्ण आकार दिलाया था। 
    इसमें 90 वर्ष का परिश्रम समाहित है। यह स्थापत्य कला का विश्व का अनुकरणीय उदाहरण है। इसमें वास्तुशास्त्र भी दृष्टिगत होता है तो वहीं कौशल्य भी वैशिष्टय स्थान रखता है। जलनिकासी के पर्याप्त प्रबंध दिखते हैं। दुनिया में इसकी खास ख्याति है।
       बुद्ध प्रतिमा के नवीकरण के लिए देश दुनिया ने व्यापक स्तर पर ध्यान दिया। चाइना सरकार ने लगभग 1963 में मरम्मत का कार्य प्रारम्भ किया था जिससे रखरखाव न होने के कारण क्षतिग्रस्त हुए हिस्से का सुधार किया जा सके। अब रखरखाव यूनेस्को के विशेषज्ञों की देखरेख में किया जाता है।  

Wednesday, 25 October 2017

स्नेक आइलैण्ड : सांपों की सल्तनत

 'सांपों की सल्तनत" जी हां, दुनिया में एक स्थान ऐसा भी है, जहां सांपों की सल्तनत अर्थात हुकूमत चलती है। आश्चर्य ही होता है कि कहीं पशु-पक्षियों-जीव-जन्तुओं की हुकूमत हो। 

  यह कोई कपोल कल्पना या किवदंती नहीं बल्कि हकीकत है। ब्राजील दुनिया में अपनी खूबसूरती-सौन्दर्य के लिए जाना जाता है लेकिन ब्रााजील की धरती पर जहरीलापन भी कम नहीं। ब्राजील का 'स्नेक आइलैण्ड" असंख्य सर्प प्रजातियों से अच्छादित है।
    धरती हो या पेड़-पौधे सभी स्थान पर सांप-सर्प मिल जायेंगे। दुनिया की शायद ही कोई सर्प प्रजाति हो जो यहां न मिले। सांप खतरनाक भी आैर खूंखार भी। खंूखार ऐसे जिसे देख कर ही इंसान की मौत हो जाये। खतरनाक ऐसे जिसके दंश से पल-दो पल की ही जिन्दगी शेष रहे। 
    विशेषज्ञों की मानें तो साओ पौलो से करीब 93 मिल दूर यह एक समुद्री टापू है। इसे ब्राजील सहित दुनिया में 'स्नेक आइलैण्ड" के नाम से जाना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो इस 'स्नेक आइलैण्ड" में सर्प संख्या का घनतत्व अत्यधिक है। आैसत हर वर्ग मीटर में पांच से छह सर्प पाये जाते हैं।
    हालात यह हैं कि एक बेड के स्थान पर छह से आठ या दस सांप आसानी से पाये जाते हैं। स्नेक आइलैण्ड के सर्प अत्यंत जहरीले अर्थात दुनिया के सबसे जहरीले सांपों में गिने जाते हैं। सर्प दंश से कोई भी व्यक्ति बमुश्किल दस से पन्द्रह मिनट जिन्दा रह पाता है।
    विशेषज्ञों की मानें तो ब्राजील में होने वाली मौतों के लिये सर्प दंश ही मुख्य कारक है। ब्राजील में 90 प्रतिशत मौतें तो सर्प दंश से होती हैं। इस आइलैण्ड का क्षेत्रफल करीब साढ़े चार लाख वर्गमीटर है। सांपों की संख्या बीस लाख से अधिक आंकलित है। इनको गोल्डन पिटवाइपर सांप के तौर पर जाना जाता है। 
   इस आइलैण्ड में शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां सांप न हो। कहीं जमीन पर सांप चलते दिखेंगे तो कहीं पेड़ पर लटके दिख जायेंगे तो कहीं चट्टान में छिपे होंगे। हालांकि ब्राजील प्रशासन की ओर इस विलक्षण टापू में आम व्यक्तियों का प्रवेश पूूर्णतय: वर्जित है।
    ब्राजीलियन नेवी ने क्षेत्र को प्रतिबंधित कर रखा है लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई इस आइलैण्ड में नहीं जाता। सर्प विशेषज्ञ एवं शोधार्थी निरन्तर 'स्नेक आइलैण्ड" आते-जाते है तो कुछ प्रवास भी करते हैं। सामान्तय इस आइलैण्ड में किसी के जाने की हिम्मत नहीं पड़ती। 
    इस आइलैण्ड का नाम 'इलहा डी क्विमाडा ग्रांड" है लेकिन सामान्यत इसे 'स्नेक आइलैण्ड" के नाम से जाना जाता है। यह पूरा क्षेत्र बंजर, चारागाह व चट्टानों से आच्छादित है। इस आइलैण्ड में इल्हा दा वनस्पति प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
    वनस्पतियों के साथ साथ पक्षियों की दर्जनों प्रजातियां कोलाहल करती रहती हैं। खास यह है कि पशु-पक्षियों व वनस्पतियों तथा सांपों की आबादी को एक दूसरे से कहीं कोई खतरा नहीं। यह वन क्षेत्र वर्षा क्षेत्र के लिए भी जाना जाता है। स्नेक आइलैण्ड के चौतरफा समुद्री क्षेत्र होने के कारण शीतलता की अनुभूति होती है।

टियाटिहुआकन : पिरामिड श्रंखला का शहर     'रहस्य एवं रोमांच" की देश-दुनिया में कहीं कोई कमी नहीं। 'रहस्य" की अनसुलझी गु...