कंबोडिया का टा प्रोहोम : नैराश्य में सौन्दर्य
'नैराश्य में सौन्दर्य" जी हां, सामान्यत: खण्डर नैराश्य का प्रतीक होते
हैं लेकिन ऐसा भी नहीं कि खण्डर में सौन्दर्य न दिखे। बस सलीके से
सजाने-संवारने की आवश्यकता होगी।
कंबोडिया का 'राजा विहार" मंदिर अपने शिल्प एवं वैशिष्ट्य के कारण विश्व
विख्यात हो रहा। हालांकि 'राजा विहार" मंदिर खण्डर की भांति विद्यमान है
लेकिन खण्डहर का सौन्दर्य भी दर्शकों-श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को आकर्षित
करता है।
कंबोडिया के इस विलक्षण
मंदिर को 'टा प्रोहोम" के नाम से देश-दुनिया में खास तौर से जाना-पहचाना
जाता है। कंबोडिया में 'टा प्रोहोम" का आशय 'पूर्वज ब्राह्मा" होता है।
कंबोडिया के सिम रीप प्रांत के अंगकोर में स्थित है।
खण्डहर में सामान्यत: नैराश्य प्रतीत होता है लेकिन 'टा प्रोहोम" में ऐसा
नहीं है क्योंकि यहां 'नैराश्य में सौन्दर्य एवं लालित्य" का बोध होता है।
कंबोडिया का यह मंदिर 12 वीं एवं 13 वीं शताब्दी के मध्य बना। कंबोडिया की
बैन शैली पर आधारित यह विलक्षण मंदिर देश-दुनिया में खास ख्याति रखता है।
इसे 'राजविहार" भी कहा जाता है।
विशेषज्ञों की मानें तो कभी मंदिर क्षेत्र शहर का हिस्सा हुआ करता था लेकिन
अब वन क्षेत्र का विशिष्ट स्थान है। अब तो मंदिर का कोना-कोना जगंल परिवेश
से आबद्ध दिखता है। इस भव्य-दिव्य मंदिर का निर्माण खमेर राजा जय वरामन ने
कराया था। अंगकोर के इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर को यूनेस्को ने 1992 में
विश्व धरोहर में शामिल किया था।
भारत एवं कंबोडिया के पर्यटन समझौता के तहत इस मंदिर के सौन्दर्य निखार
एवं संरक्षण में भारतीय विशेषज्ञों की भी विशेष भूमिका रहती है। इस मंदिर
में मुख्यत: बौद्ध दर्शन होते हैं। बौद्ध अनुयायियों के बीच इसकी मान्यता
बौद्ध मठ के तौर पर भी है। इस मंदिर की दिव्यता एवं भव्यता का सहज अनुमान
इसी से लगाया जा सकता है कि यहां 12500 से अधिक श्रद्धालुओं-दर्शकों एवं
पर्यटकों के लिए अपेक्षित एवं पर्याप्त स्थान है।
विशेषज्ञों की मानें या किवदंती मानें तो इस भव्य-दिव्य मंदिर के
निर्माण में आत्माओं का भी सहयोग रहा। आसपास के गांव व अन्य करीब आठ लाख से
अधिक आत्माओं का सेवाओं एवं आपूर्ति में सहयोग माना जाता है। मंदिर के लिए
श्रम के साथ ही सोना, मोती, रेशम व धन की उपलब्धता भी सुनिश्चित करायी गयी
थी। मंदिर में उपग्रह का अंकन है।
खास तौर से बौद्ध धर्म को रेखांकित किया गया लेकिन राजा की मां, राजा के
गुरु, जय मंगलला, बोधिसत्व, लोकेश्वर की करुणा आदि दृश्यांकित है।
विशेषज्ञों की मानें तो 15 वीं शताब्दी में खमेर साम्राज्य के पतन के बाद
'टा प्रोहोम" मंदिर को छोड़ दिया गया। सदियों उपेक्षित रहने से मंदिर खण्डर
में तब्दील हो गया। अन्तोगत्वा, 21 शताब्दी में अंगकोर के मंदिरों को
सुरक्षित-संरक्षित एवं पुर्नस्थापना के सार्थक प्रयास शुरु हुये।
'टा प्रोहोम" को सौन्दर्य प्रदान करने की इच्छाशक्ति इकोले फ्रांसीज डी
एक्सट्रैम ओरियेंट में दिखी। शनै-शनै यह विलक्षण मंदिर उपेक्षा से उबरने
लगा। उपेक्षा की अवधि में मंदिर का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका था।
विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 2013 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मंदिर
का गौरव व स्वरूप वापस लाने की कोशिशें प्रारम्भ कीं।
विशेषज्ञ अन्तोगत्वा, मंदिर के अधिसंख्य हिस्सों को वास्तविक दशा-दिशा
में लाने में कामयाब रहे। पर्यटकों की सहूलियतों को ध्यान में रखते हुये
लकड़ी के रास्ते, प्लेटफार्म व घुडसवारी के लिए रेलिंग आदि का निर्माण कराया
गया।
मंदिर का क्षेत्रफल करीब
साढ़े छह लाख वर्गफुट से अधिक है। यहां एक सुन्दर अभ्यारण भी है। इसे विश्व
के शीर्ष बौद्ध स्थलों में से एक माना जाता है।
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