Monday, 23 October 2017

वाटर स्पाउट्स : विलक्षणता का एक आयाम

    जल केवल जीवन ही आनन्द का परिचायक भी है। साफ सुथरा पानी पियेंगे तो प्यास बुझेगी। शारीरिक आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति होगी लेकिन पानी की अठखेलियां तन-मन-मस्तिष्क प्रफुल्लित-पुलकित अवश्य होगा। मशीनी रैन डांस-मशीनी वाटर डांस तो मेगाटाउन्स में देखने को मिल जायेंगे लेकिन नेचुरल वाटर डांस देखने के लिए नेचर की गोद में ही जाना होगा।

 'वाटर स्पाउट्स" से ख्याति जल नृत्य अर्थात वाटर डांस नीदरलैण्ड, आस्ट्रेलिया व कतर आदि में देखे जा सकते हैं लेकिन फ्लोरिडा का वाटर स्पाउट्स विलक्षण है।
      सामान्यत: धूूली बवंडर भयभीत करने वाले अथवा डरावने होते हैं लेकिन फ्लोरिडा के जल बवंडर रोमांचित करने वाले होते हैं। इसे जल स्तम्भ, जलव्रज, जलवज्र, बवंडर या चक्रवात कुछ भी कह सकते हैं। यह जल से बने स्तम्भ के आकार के दिखते हैं। मुख्यत: इस तरह के जलस्तम्भ यूरोप एवं अंटार्कटिका में बनते-बिगड़ते दिखते हैं।
    दुनिया के अन्य देशों व अन्य स्थानों पर भी दिखते हैं किन्तु अत्यंत मुश्किल से। फ्लोरिडा में 'वाटर स्पाउट्स" समुद्री इलाके में आम हैं। 'वाटर स्पाउट्स" किसी भी क्षण में मनमोह लेते हैं। कहीं यह तीन चरणों में होता है तो कहीं पांच चरणों में दिखता है।
    'वाटर स्पाउट्स" एक गोला अंधकार से युक्त होता है तो दूसरा गोला घूमता सा प्रतीत होता है। एक अन्य में यह अंगूठी की भांति दिखता है। एक अन्य में यह एक जल स्तम्भ के शक्ल में दिखता है। अन्तत: कुछ पलों में यह सब विलुप्त हो जाता है।
    'वाटर स्पाउट्स" करीब दो किलोमीटर के दायरे में दिखते हैं। हालांकि यह दायरा कम या अधिक भी हो सकता है। जलवायु परिवर्तन या अनुकूल वातावरण का प्रभाव भी 'वाटर स्पाउट्स" पर पड़ता है। खास बात यह है कि 'वाटर स्पाउट्स" में बवंडर जैसे गुण नहीं होते। यह सूखे मौसम में भी बनते हैं। 
   हालांकि इनका जीवन चक्र अत्यधिक लघु अर्थात बीस मिनट के आसपास ही होता है। यह एक प्रकार से बादलों के आवेग-आवेश से बनते हैं। बादलों का आवेग नीचे आने लगता है तो जल अर्थात पानी की क्रिया अथवा क्रीड़ा दिखने लगती है।
   मुख्यत: यह जल वाले क्षेत्रों में ही बनते बिगड़ते हैं। कारण जल को आसानी से घूमने का मौका मिल जाता है। फ्लोरिडा के जलवायु में 'वाटर स्पाउट्स" निरन्तर दिखते हैं।

Wednesday, 18 October 2017

इग्वाजू नदी : पौने तीन सौ झरनों की श्रंखला

   'सौन्दर्य का खजाना" निश्चय ही मन-मस्तिष्क को तारो-ताजा एवं प्रफुल्लित कर देता है। देश-दुनिया में प्राकृतिक खजाना की कहीं कोई कमी नहीं।

   देश-दुनिया के लिए यह जहां एक ओर राजस्व का बड़ा माध्यम है तो वहीं दूसरी ओर पर्यटकों के विशेष आकर्षण के केन्द्र भी हैं। इनमें अद्भूत एवं विलक्षणता से परिपूरित दृश्य मन को लुभाते हैं। अर्जेंटीना एवं ब्रााजील सीमा की 'नदी इग्वाजू" अपने प्राकृतिक सौन्दर्य से देश-दुनिया के आकर्षण का केन्द्र बनी है। देश-दुनिया के लाखों पर्यटक इस नदी की विलक्षणता की एक झलक पाने के लिए लालायित दिखते हैं। 
   दुनिया के सात प्राकृतिक चमत्कारों में   'इग्वाजू नदी" भी शामिल है। नदी के झरनों को देख कर कौतुहल होता है कि आखिर यह भी है ?। नदी क्षेत्र में एक स्वप्न सा लगता है क्योंकि एक साथ एक स्थान पर पौने तीन सौ झरनों को गिरते देखना किसी स्वप्न से कम नहीं लगता। झरनों का यह समूूह करीब तीन किलोमीटर के दायरे में फैला है।
    एक साथ झरनों के समूह-श्रंखला को देखना किसी रोमांच से कम नहीं होता। वर्ष 1986 में झरनों की इस श्रंखला को यूनेस्को ने वल्र्ड हेरिटेज क्षेत्र घोषित किया है। झरनों के इस क्षेत्र को मिसिओनेस के नाम से जाना जाता है। अर्जेंटीना को दुनिया में सर्वाधिक प्राकृतिक सौन्दर्य वाला देश माना जाता है। इन प्राकृतिक सौन्दर्य में झरनों की यह श्रंखला भी है। इग्वाजू नदी का यह झरना श्रंखला विश्व में प्रसिद्ध है।
    अर्जेंटीना ने इस क्षेत्र को राष्टीय उद्यान क्षेत्र घोषित किया है। अर्जेंटीना का सौन्दर्य से परिपूरित यह क्षेत्र करीब बीस किलोमीटर के दायरे में है जबकि झरना श्रंखला करीब तीन किलोमीटर दायरे में है। इग्वाजू नदी करीब 1200 किलोमीटर की यात्रा तय करती है। इसका उद्भव ब्राजील से है तो अर्जेंटीना में इसकी खूबसूरती दिखती है। नदी की इस यात्रा में पठार श्रंखला की समृद्धता दिखती है। 
    बलुआ पत्थर श्रंखला की इस क्षेत्र में बहुलता है। झरना एवं नदी क्षेत्र में परतों एवं दरारों की श्रंखला दिखती है। यह प्राकृतिक सौन्दर्य का अद्भूत दृश्य होता है। भौगोलिक दशा ऐसी है कि झरना एवं नदी के जल प्रवाह से भीषण एवं भयंकर गर्जना सुनाई देती है।
      ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे कोई राक्षस गर्जना कर रहा हो। किवदंती है कि इस नदी में बोई नाम का सांप रहता है। यह सांप नित्य वर्ष आदिवासी समुदाय से एक आैरत की बलि लेता था। जिससे एक भय भी था। एक बार एक बहादुर महिला गुआरानी अबोरीगिन ने इस मिथक को तोड़ दिया। गुआरानी ने नदी से संघर्ष कर खुद को बचा लिया। वस्तुत: जल प्रवाह में महिला का बलिदान हो जाता था।
   सौन्दर्य बोध को रेखांकित करने वाला झरना श्रंखला चांद की खूूबसूरती का अवलोकन कराता है। झरना श्रंखला के बीच चांद ऐसे दिखता है, जैसे चांद झरनों के साथ चल रहा है। झरना श्रंखला को देखने के लिए नदी के उपर एक शानदार पुल भी बना है।
  जिससे पर्यटक-दर्शक झरनों को आैर अधिक निकट जाकर सौन्दर्य का आनन्द ले सकते है। पर्यटन की दृष्टि आवागमन के संसाधन विकसित किये गये हैं।

Tuesday, 17 October 2017

कुलधरा : विलक्षण गांव, फिर बस नहीं सका

    देश-दुनिया में अद्भुत विलक्षण संरचनाओं की कहीं कोई कमी नहीं। श्राप ने हिन्दुस्तान के एक गांव की दशा-दिशा बदल दी तो गांव पुरातत्व विभाग की सम्पत्ति बन गया तो वहीं विलक्षणता से देश-दुनिया के विशेषज्ञ आश्चर्यचकित हैं। 

    जी हां, आश्चर्य यह कि आखिर कुछ ही पलों में पांच हजार से अधिक परिवारों की आबादी कहां लुप्त हो गयी। राजस्थान के जैसलमेर से करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर गांव कुलधरा है। इस विलक्षण गांव से रात में अचानक आबादी गायब-लुप्त हो गयी। आखिर इस गांव की आबादी कहां गयी, किसी को कुछ भी पता नहीं।
     राजस्थान के कुलधरा गांव में आज भी छह सौ से अधिक घर-घरौंदे अस्तित्व में दिखते हैं लेकिन सब कुछ विरान है। विशेषज्ञों की मानें तो सालों साल  से यह गांव विरान पड़ा है। मूलत: यह गांव राजस्थान के पालीवाल ब्रााह्मण परिवारों का है। कभी आर्थिक सम्पन्नता से भरपूर अब मरघट जैसी दशा में है।
    विशेषज्ञों की मानें तो कुलीन ब्रााह्मण परिवारों ने जैसलमेर आैर आसपास के इलाकों में चौरासी गांव विकसित किये। यह विकास पांच सौ वर्ष में किया गया। जैसलमेर रियासत के दीवान सालिम सिंह के अत्याचार-उत्पीड़न के विरोध में बाशिंदों ने गांव से पलायन किया। पालीवाल परिवारों पर कर एवं लगान की बेइंतहां बढ़ोत्तरी की गयी। जिससे खेती व व्यापार सब कुछ चौपट हो गया।
    पालीवाल समुदाय दीवान के अत्याचारों से अति दुखी था। हद तो तब हो गयी, जब दीवान ने पालीवाल समुदाय की एक युवती को हासिल करना चाहा। बस इसके बाद समुदाय ने विरोध कर दिया। पालीवाल समुदाय ने तय किया कि सम्मान व इज्जत पर चोट बर्दास्त नहीं। अन्तोगत्वा, गांव कुलधरा के बाशिंदों ने रात में अचानक गांव खाली कर दिया। साथ ही श्राप भी दिया कि अब इस गांव में कोई बस नहीं पायेगा। गांव छोड़ने से पहले कोठारी गांव में पंचायत की।
    निर्णय के मुताबिक पालीवाल समुदाय ने गांव खाली कर दिया। आश्चर्य यह कि कुलधरा गांव का बाशिंदा पालीवाल समुदाय आखिर कहां गया क्योंकि गांव से पलायन के बाद समुदाय का कहीं कोई अता-पता नहीं चला। विशेषज्ञों की मानें तो इन गांव को भले ही सात सौ-आठ सौ साल पहले बसाया गया हो लेकिन गांव का निर्माण वैज्ञानिक तौर-तरीके से किया गया था क्योंकि राजस्थान में जहां एक ओर रेगिस्तान की तपिश महसूस की जाती है वहीं इस गांव के घरों में शीतलता का अनुभव होता है।
    घरों के भीतर पानी के कुण्ड-कुंआ, ताक-चाक आैर सीढ़ियां बेहतरीन हैं। घरों की बनावट ऐसी कि हवा चले तो बांसुरी की तान सुनाई दे। घरों में शीतलता का अनुभव। राजस्थान के रेगिस्तान में खेती का होना, पालीवाल समुदाय की समृद्धि का रहस्य रहा। आखिर रेगिस्तान में खेती कैसे होती थी ? विशेषज्ञों की मानें तो पालीवाल समुदाय के अचानक पलायन के बाद आसपास के बाशिंदों ने गांव में बसने की कोशिश की लेकिन कोई कामयाब नहीं हो सका। 
    श्राप का दुष्प्रभाव आज भी दिखता है। कुलघरा गांव एक अवशेष के तौर पर आज भी देखा जा सकता है। विलक्षणता को देखने देश-विदेश के पर्यटक बड़ी संख्या में आते है। यह गांव अब पुरातात्विक विभाग संरक्षित है।

Monday, 16 October 2017

फायरफॉल : प्राकृतिक करिश्मा

   देश-दुनिया में करिश्मा-चमत्कारों की कहीं कोई कमी नहीं। करिश्मा-चमत्कार को प्राकृतिक आभा का उद्भव कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

    कल्पना करें कि किसी पहाड़ के झरना से पानी के स्थान पर आग का प्रवाह हो रहा हो तो शायद काफी कुछ अचरज सा लगेगा लेकिन इस दुनिया में ऐसा भी है। पहाड़ से आग का झरना देख कर कहीं अचरज होगा तो वहीं दहशत भी दिखेगी। 
    अमरीका के कैलिफोर्निया स्थित केयोजमाइट राष्ट्रीय उद्यान में पहाड से गिरने वाला झरना देख कर कहीं न कहीं सहम जायेंगे लेकिन इस अद्भूत झरना की एक झलक पाने के लिए लाखों पर्यटक अमेरिका आते-जाते हैं। 
     इसे आग उगलने वाले पहाड को 'फायरफॉल" के नाम से जाना-पहचाना जाता है। इस राष्ट्रीय उद्यान से करीब दो हजार फुट की ऊंचाई वाला यह पहाड सौन्दर्य का अनुपम उदाहरण बना है। वस्तुत: यह पहाड आग नहीं उगलता बल्कि आग उगलने का करिश्मा रोशनी का करिश्मा है। 
     सूरज की रोशनी से ऐसा आभास होता है कि पहाड से निकलने वाला पानी नहीं आग का झरना है। इसके सौन्दर्य का सहज आंकलन इसी से किया जा सकता है कि वर्ष 1952 में हालीवुड फिल्म 'दि केन मुटिनी" की शूटिंग इस विलक्षण स्थल पर की गयी थी। 
    इसमें इस अद्भूत झरना को दृश्यावलोकित किया गया। दिलचस्प यह रहा कि यह पहाड एक होटल के शीर्ष पर है। वर्ष 1870 में होटल का मालिक अपने विजिटर के साथ आया था। पहाड-झरना का करिश्मा देख कर स्थल को पर्यटन का स्वरुप दे दिया। 
     हालात यह हैं कि देश-दुनिया से साल में 3.50 मिलियन से अधिक पर्यटक इस आग उगलते झरना को देखने आते हैं। 'फायरफॉल" के इस झरना पर वस्तुत: सूरज की रोशनी पहाड से टकरा कर पड़ती है। पहाड से टकरा कर आने वाली रोशनी झरना के पानी के रंग को आग के रंग में बदल देती है। 
   शाम करीब 5.30 बजे इस स्थल पर अद्भूत नजारा उत्पन्न होता है। यह एक चमत्कारी परिवर्तन होता है। विश्व के आकर्षण वाले राष्ट्रीय उद्यानों में इसे एक माना जाता है। पर्यटकों की आवाजाही निरन्तर बनी रहती है।

Sunday, 15 October 2017

कासा बाटलो : कहीं हड्डियां तो कहीं खोपड़ी

    इच्छाशक्ति हो तो क्या नहीं हो सकता ! जी हां, बस कुछ नया या अनूठा करने की इच्छा हो तो निश्चित नया आयाम विकसित होगा।


  देश-दुनिया में असंख्य अजूबा या विस्मय हैं। स्पेन के बार्सिलोना में सनक या इच्छाशक्ति ने एक ऐसा महल बना डाला जिसे देखने के लिए दुनिया भर पर्यटक-बाशिंदे आते हैं।  इस खास महल 'कासा बाटलो" को देखने या घूमने के लिए 'ऑनलाइन" एण्ट्री टिकट भी बुक कराये जा सकते हैं। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि 'कासा बाटलो" दुनिया का खास एवं अद्भूत महल है।
     महल 'कासा बाटलो" वैसे तो बना पत्थर, मोजेक एवं बालू के सम्मिश्रण से है लेकिन ऐसा एहसास होता है कि इसमें हड्डियों का उपयोग किया गया है। आकार-प्रकार एवं महल की संरचना हड्डियों पर आधारित दिखती है लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। बार्सिलोना के इस महल की अद्भूत डिजाइन इसे कुछ खास बनाती है। महल 'कासा बाटलो" को मशहूर वास्तुकार एंटोनी गौड़ी ने डिजाइन किया।
   वास्तुकार एंटनी गौड़ी को खास तौर से अलंकरण, गुफाओं की संरचना एवं प्राकृतिक परिस्थितियों की संरचना के लिए जाना जाता है। इस खूबसूरत महल का स्वामित्व जोसेप बाटलो एवं कासा बाटलो के पास है। इसे जोसफ बाटलो हाउस भी कहा जाता है। महल को करीब एक सौ पन्द्रह साल पहले 1900 में खरीदा गया।
    नव-डिजाइन व नव-निर्माण को ध्यान में रख कर इसे ध्वस्त कर दिया गया। वास्तुकार एंटोनी गौडी़ की डिजाइन के आधार पर इसका निर्माण किया गया। इसमें रंगीन स्तरित बालू, खास किस्म के पत्थर, मोजैक, सेरेमिक टाइल्स आदि का उपयोग किया गया।
    दिलचस्प विशेषता यह है कि बालकनी, कक्ष, खम्भे सहित सभी कुछ हड्डियों के आकार-प्रकार एवं सरंचना आधारित हैं। महल को गौर से देखें तो खोपड़ी नुमा ढ़ांचा दिखता है। ऐसा प्रतीत होता है कि बालकनी की कैनोपी इंसानी खोपड़ी है। कांच की खिड़कियां भी खास डिजाइन हैं। 
     इंटीरियर भी हड्डियों का आभास कराता है। एंटोनी ने इसे 1904 में डिजाइन किया लेकिन इसके निर्माण में कई वर्ष लग गये। महल की आकृति में कहीं चाकू का आभास होता है तो कहीं अजगर या तराजू दिखता है। खास तौर से अब इस शानदार एवं खास महल का संग्रहालय के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है। 
     वास्तुकला का यह महल एक शानदार उदाहरण है। यहां प्रवेश के लिए पर्यटक को 18 यूरो बतौर शुल्क चुकाने होते हैं। बार्सिलोना में इस महल को 'कंकाल जैविक गुणवत्ता" का नमूना माना जाता है।
    अनियमित अण्डाकार खिड़कियां बताती हैं कि खास बनाने में कहीं कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गयी। बालकनी में खोपड़ी दिखती है तो खम्भों में हड्डियां साफ तौर पर नजर आती हैं।

Friday, 13 October 2017

ऑकलैण्ड का खास यलो ट्री हाउस रेस्टोरेन्ट

    'कंक्रीट के जंगल" शायद अब रास नहीं आते। जी हां, देश-दुनिया में कंक्रीट के जंगल लगातार तेजी से बढ़ हैं। कुछ यूं कहें कि गंगनचुम्बी इमारतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

  ऐसे में अब 'इको फ्रैण्डली" हब अब बाशिंदों की पसंद बनने लगे। 'इको फ्रैण्डली" अर्थात सब-कुछ प्रकृति की गोद से उभरा। ऑकलैण्ड न्यूजीलैण्ड के इंजीनियर्स ने एक रैस्टोरेन्ट को कुछ इस तरह रचा कि दुनिया दीवानी हो गयी। न्यूजीलैण्ड के ऑकलैण्ड में वास्तुकार, इंजीनियर्स व प्रबंधन के गठजोड़ ने खास किस्म का रेस्टोरेन्ट बना डाला। 
   इस खूबसूरत रेस्टोरेन्ट को नाम दिया गया 'यलो ट्री हाउस रेस्टोरेन्ट" । ऑकलैण्ड के आर्कीटेक्ट पीटर इअसिंग व लुसी गौंटलेट ने इसे डिजाइन किया। परियोजना प्रबंधक बिल्डिंग इंटेलिजेंस ग्रुप के गैरेथ स्क्रीवोअ, ब्लेयर वोल्फग्राम, जो होल्डन आदि रहे। 
   इस रेस्टोरेन्ट में रोशनी की व्यवस्थाओं से लेकर फर्नीचर तक की सभी की अपनी अलग-अलग जिम्मेदारियां रहीं। ऑकलैण्ड के इस खूबसूरत रेस्ट्रां में लंच व डिनर के लिए दूर-दराज से बाशिंदे व पर्यटक आते हैं। नाइट डिनर हो या कैंडल डिनर। यह स्थान कभी खाली नहीं रहता। 
    खास यह है कि इस बेहतरीन 'रेस्ट्रां" में एक साथ अधिकतम डेढ़ दर्जन अर्थात 18 मेहमान ही भोजन का लुफ्त उठा सकते हैं। यह 'यलो ट्री हाउस रेस्टोरेन्ट" एक विशाल पेड की शाखाओं में रचा-बसा है। इसकी ऊंचाई करीब चालीस फीट है। आसपास घास का खुला मैदान। रेस्टोरेन्ट में रसोई से लेकर शौचालय आदि सभी व्यवस्थायें सुनिश्चित हैं।
      करीब दस मीटर चौड़ाई वाला यह खास रेस्टोरेन्ट खासी ख्र्याति अर्जित कर रहा है। कैफे शैली का यह रेस्टोरेन्ट मेहमानों की आवाजाही से हमेशा गुलजार रहता है। मौसम का इस रेस्टोरेन्ट पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। डिजाइन एवं निर्माण के लिए इसे न्यूजीलैण्ड की शासकीय मान्यता हासिल है।

Thursday, 12 October 2017

प्लेटविक झील : अपार खनिज सम्पदा

    दुनिया में विलक्षणता की कहीं कोई कमी नहीं। विलक्षण परिवेश हो या विलक्षण व्यक्तित्व कोई भी देखने-मिलने की ललक रख सकता है।

   क्रोएशिया की लेक (झील) श्रंखला भी अपनी विलक्षणता के लिए दुनिया में अपनी एक अलग पहचान रखती है। खास बात यह है कि क्रोएशिया की झील श्रंखला में एक दो नहीं बल्कि करीब डेढ़ दर्जन झीलें एक दूसरे से ताल्लुक रखती हैं फिर भी सभी का अस्तित्व स्वतंत्र एवं अलग है। 
    क्रोएशिया की प्लेटविक लेक एक प्राकृतिक बांध के तौर पर दिखती है। इसका सौन्दर्य देखने हर साल एक लाख से भी अधिक पर्यटक आते है। क्रोएशिया ने इस झील श्रंखला को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया है। यूनेस्को वल्र्ड हेरिटेज साइट पर इसे स्थान मिला है।
    क्रोएशिया ने इसे वर्ष 1949 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया था। यह विलक्षण झील क्रोएशिया में बोस्निया एवं हर्जेगोविना की सीमा पर स्थित है। क्रोएशिया की इस झील प्लेटविक लेक खनिज सम्पदाओं से अति समृद्ध है। चूंकि राष्ट्रीय उद्यान घोषित है लिहाजा किसी भी प्रकार के खनन के लिए प्रतिबंधित है।
    यूनेस्को ने इस 1979 में विश्व धरोहर में शामिल किया था। यह क्रोएशियाई एवं एड्रियाटिक तटीय क्षेत्र है। यह झील करीब 296.85 वर्ग किलोमीटर अर्थात 73,350 एकड़ में फैली है।
    खनिज सम्पदाओं के साथ ही वन्य जीवन की भी बहुलता है। वन बिलाव, यूरोपीय बिल्लियां एवं भेडियों के असंख्य प्रजातियां इस क्षेत्र में स्वच्छंद विचरण करती हैं। पर्यटकों की आवाजाही से झील क्षेत्र गुलजार रहता है।

टियाटिहुआकन : पिरामिड श्रंखला का शहर     'रहस्य एवं रोमांच" की देश-दुनिया में कहीं कोई कमी नहीं। 'रहस्य" की अनसुलझी गु...