Monday, 15 January 2018

टियाटिहुआकन : पिरामिड श्रंखला का शहर

    'रहस्य एवं रोमांच" की देश-दुनिया में कहीं कोई कमी नहीं। 'रहस्य" की अनसुलझी गुत्थियां वैज्ञानिकों से लेकर आम आदमी तक को चिंतन-मनन-विमर्श को विवश कर देती हैं।

  मैक्सिको का 'टियाटिहुआकन" शहर सदियों बाद भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बना हुआ है। 'टियाटिहुआकन" शहर पिरामिड श्रंखला का शहर है लेकिन यह खण्डहर शहर रहस्यों को छिपाये है।
    वैज्ञानिक सैकड़ों साल से रहस्य की गुत्थी सुलझाने की कोशिश में लगे हैं। फिलहाल तो मैक्सिको का 'टियाटिहुआकन" शहर रहस्य में उलझी एक विरासत से अधिक कुछ भी नहीं दिख रहा। 
    वैज्ञानिकों की दृष्टि में पिरामिड़ों का यह एक खण्डहर शहर है। पिरामिड़ों के इस खण्डहर का वास्तविक नाम भले ही कुछ आैर हो लेकिन देश-दुनिया में इसे 'टियाटिहुआकन" की ख्याति हासिल है। विशेषज्ञों की मानें तो इस पिरामिड शहर की खोज एजटेक्स ने की थी। एजटेक्स ने ही इस स्थान को 'टियाटिहुआकन" संज्ञा दी थी। 'टियाटिहुआकन" का शाब्दिक अर्थ 'प्लेस आफ गॉड" होता है।
     विशेषज्ञों की मानें तो एजटेक्स की दृष्टि में मध्य युगीन यह शहर अचानक प्रकट हुआ था। इस शहर का निर्माण किसने किया आैर कब किया ? यह रहस्य अभी तक बना हुआ है। मैक्सिको सिटी के ठीक बाहरी इलाके में स्थित यह विस्मयकारी शहर करीब पांच सौ वर्ष पहले खण्डहर में तब्दील हो गया था। 'टियाटिहुआकन" का वास्तुशिल्प विलक्षण है।
      विशेषज्ञों की मानें तो इस विलक्षण शहर का निर्माण खास तौर से अर्बन ग्रिड सिस्टम से किया गया था। न्यूयार्क सिटी की बनावट भी इसी सिस्टम पर आधारित है। विशेषज्ञों का आंकलन है कि इस शहर की आबादी करीब पच्चीस हजार के आसपास रही होगी।पिरामिड से अभी भी मानव कंकाल अर्थात हड्डियों का ढ़ांचा मिलता रहता है।
     इससे इतना तो अवश्य स्पष्ट होता है कि बड़ी तादाद में इंसानी बलिदान हुआ होगा। पिरामिड श्रंखला का यह शहर खण्डहर होने के बावजूद दर्शकों-पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहता है। देश-दुनिया के दर्शक-पर्यटक निरन्तर आते-जाते रहते हैं।

Friday, 12 January 2018

खाजू ब्रिज : नायाब अरेबियन शिल्पकला

    'सौन्दर्य शास्त्र" की इबारत भले ही कहीं न दिखे लेकिन सौन्दर्य बोध देश-दुनिया को अपने शिल्प से बरबस आकर्षित करता है।

  ईरान को भले तेल उद्योग-धंधे एवं रेगिस्तानी इलाके के तौर पर देश-दुनिया में देखा जाता हो लेकिन उसके शिल्प का अपना एक अलग मुकाम है। 'अरेबियन शिल्पकला" की अपनी विशिष्टताएं हैं।
    'अरेबियन शिल्पकला" का सौन्दर्य खास ही नहीं आम अर्थात सार्वजनिक स्थलों पर भी दिखता है। रेगिस्तान में जहां एक ओर जल उपलब्धता का संकट खड़ा दिखता हो वहीं शिल्प सौन्दर्य विशिष्ट हो तो 'वाह वाह" लाजिमी हो जाता है।
     ईरान का इस्फान शहर विशिष्टताओं के साथ ही सौन्दर्य की गाथा भी संग रखता है। इस्फान का 'खाजू आर्च ब्रिज" अरेबियन शिल्पकला का अनुपम उत्कीर्ण शिल्प है। कोरइ नदी की कलकल बहती धारा के उपर शिल्प सौन्दर्य का निखार स्वत: आकर्षित करता है। निर्मल जलधारा के उपर झूलता ब्रिज (पुल) देश-दुनिया के लिए एक विशिष्ट आकर्षण है।
     खास यह है कि इस पुल की बनावट सामान्य पुलों जैसी नहीं है। सामान्यत: यह पुल शानदार महल अथवा बावड़ी जैसा दिखता है। सामान्यत: पर्यटक इस पुल से गुजरने के बजाय शिल्पकला का आनन्द एवं अनुभूति के लिए रुकते हैं।
    हालांकि यह पुल बहुत अधिक लम्बा नहीं है लेकिन पुल की ख्याति बहुत अधिक है। 'खाजू आर्च ब्रिज" वैसे तो 1650 ईसवी में बना था लेकिन देख कर ऐसा एहसास होता है कि जैसे इसका निर्माण अभी हाल के कुछ वर्षों पूर्व हुआ हो। पुल 133 मीटर लम्बा है तो वहीं 23 मेहराब भी हैं। मेहराब का शिल्प देखते ही बनता है। बादशाह शाह अब्बास ने इस बेशकीमती एवं अति खूबसूरत पुल का निर्माण कराया था। इस ब्रिज के मध्य में दो विशाल कक्ष हैं।
     इन विशाल-दिव्य-भव्य कक्ष का उपयोग बादशाह शाह अब्बास व उनके वारिसान आरामगाह के तौर पर करते थे। हालांकि अब इन कक्ष को आम जनता को अवलोकनार्थ खोल दिया गया है। ईरान का यह ब्रिज अरेबियन शिल्पकला का अनुपम एवं नायाब शिल्प है।
    विशेषज्ञों की मानें तो फारस के बादशाहों ने घोड़ों एवं बैलगाडि़यों को नदी पार कराने के लिए पुल की आवश्यकता महसूस हुयी थी। हालांकि अब पुल बाढ़ के संभावित खतरों को रोकने में कारगर दिखता है। पुल पर दो अष्टभुजाकार पैवेलियन बने हैं। पैवेलियन से पुल के सौन्दर्य को निहारा जा सकता है। खूबसूरती एवं सुकून यहां महसूस किया जा सकता है।

Monday, 20 November 2017

चम्बल का संसद : इंकतेश्वर महादेव

     ऐसा नहीं कि शिल्प केवल बुलंद इमारतों एवं अट्टालिकाओं में ही दिखे। चम्बल को भले ही बीहड़ों की भयावहता एवं दुर्यान्त डकैतों की आश्रय स्थली के तौर पर देखा जाता हो लेकिन कलाशिल्प-वास्तुशिल्प में भी पीछे नहीं।

  मध्यकालीन शिल्पियों एवं वास्तुविद-वास्तु शिल्पकारों ने 'अंदाज-ए-बयां" कुछ ऐसा अंजाम दिया, जो देश-दुनिया का एक नायाब तोहफा बन गया। मध्यकालीन शिल्पकारों ने चम्बल की एक विशाल चट्टान को इच्छाशक्ति से विशिष्ट बना दिया। ब्रिाटिश आर्कीटेक्ट सर हरबर्ट बेकर भी स्थापत्य कला एवं संरचना को देख अभिभूत हो गए थे।
    जी हां, इस स्थान को खास तौर से 'चम्बल का संसद" की संज्ञा दी गयी है। 'चम्बल का संसद" कहा भी क्यूं न जाए ? क्योंकि भारतीय संसद का आकार-प्रकार-ढ़ांचा सभी कुछ इस भव्य-दिव्य देवालय पर आधारित है। मध्य प्रदेश के चम्बल मुरैना में मितावली पर स्थित है। इकोत्तरसो या इंकतेश्वर महादेव के नाम से ख्याति प्राप्त यह 'देवालय" भूमि तल से करीब तीन सौ फीट ऊंचाई पर स्थित है।
      विशेषज्ञों की मानें तो 'भारतीय संसद" ब्रिाटिश वास्तुविद सर एडविन ल्युटेन की मौलिक संरचना माना जाता है लेकिन यह भी कटु सत्य है कि इस देवालय की संरचना भी भारतीय संसद जैसी है। धार्मिक क्षेत्र में इस देवालय को चौसठ योगिनी शिव मंदिर की मान्यता है। ग्रेनाइट स्टोन (पत्थर) से बना यह देवालय लालित्य-सौन्दर्य एवं माधुर्य की विलक्षण संरचना है।
       भारतीय पुरातत्व विभाग की मानें तो इस देवालय का निर्माण 9 वीं शताब्दी में हुआ। गोलाकार संरचित इस देवालय के मध्य में मुख्य गर्भगृह स्थापित है। मुख्य शिवलिंग इसी गर्भगृह में स्थापित है। विशेषज्ञों की मानें तो सन् 1323 में महाराजा देवपाल ने शिवलिंग स्थापित कराया था। चौसठ योगिनी का यह भव्य-दिव्य देवालय वास्तुकला एवं एवं गौरवशाली परम्परा के लिए ख्याति रखता है।
      अफसोस, ख्याति होने के बावजूद मध्य प्रदेश या देश के पर्यटन क्षेत्र में यह स्थान कोई खास ख्याति नहीं बना सका। विशेषज्ञों की मानें तो तत्कालीन क्षत्रिय महाराजाओं ने इसका निर्माण कराया था। इस भव्य-दिव्य देवालय में गोलाकार चौसठ कक्ष संरचित हैं। प्रत्येक कक्ष में एक एक शिवलिंग प्राण प्रतिष्ठित है। इसके मुख्य परिसर में भव्य-दिव्य शिवमंदिर है। 
     शिव के साथ ही देवी योगिनियां भी प्राण प्रतिष्ठित हैं। खास बात यह है कि योगिनियों सहित शिव के इस मंदिर में केवल हिन्दू धर्मावलम्बी ही पूजन-अर्चन नहीं करते बल्कि अंग्रेज-विदेशी नागरिक भी श्रद्धापूर्वक नतमस्तक होते हैं।
      विशेषज्ञों की मानें तो देश में चार चौसठ योगिनियों के मंदिर हैं। इनमें दो ओडिशा में आैर दो मध्य प्रदेश में हैं। यहां सनातन धर्म एवं तांत्रिक क्रियाओं का पूर्ण विश्वास है। खास यह है कि इस भव्य-दिव्य देवालय में एक सौ एक खम्भों की आकर्षक श्रखला विद्यमान है। प्राचीनकाल में तांत्रिक अनुष्ठान का यह अत्यंत विशाल एवं बड़ा केन्द्र था। इस भव्य-दिव्य देवालय तक पहंुचने के लिए करीब दो सौ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

Sunday, 19 November 2017

हाइपेरियन : दुनिया का सबसे ऊंचा पेड़

     दुनिया-धरती में 'अजूबा" की कहीं कोई कमी नहीं। 'सौन्दर्य-लालित्य एवं माधुर्य" से लबरेज 'अजूबा" धरती में कहां नहीं ? वन एवं पर्यावरण श्रंखला में भी 'सौन्दर्य-लालित्य एवं माधुर्य" कम नहीं। 

   इस प्राकृतिक सम्पदा को सुरक्षित-संरक्षित रखना भौतिकतावादी युग में भले ही कुछ मुश्किल भले ही हो गया हो लेकिन प्राकृतिक सम्पदा श्रंखला का दुनिया धरती में अपार भण्डार है। इन प्राकृतिक सम्पदाओं में विलक्षणता भी विद्यमान है। 
      विशेषज्ञों की मानें तो न्यूयार्क का 'स्टैच्यू आफ लिबर्टी" अपनी शीर्षता के लिए दुनिया में ख्याति रखता है लेकिन दुनिया की वन एवं पर्यावरण सम्पदा श्रंखला 'स्टैच्यू आफ लिबर्टी" को चुनौती देती है। कैलिफोर्निया का 'हाइपेरियन" वृक्ष-पेड़ अपनी ऊंचाई के लिए ख्याति रखता है।
    विशेषज्ञों की मानें तो 'हाइपेरियन" वृक्ष धरती का सबसे अधिक ऊंचाई वाला पेड है। इसे कैलिफोनिया में रेडवुड अर्थात लाल लकड़ी की संज्ञा से नवाजा गया है। इन विलक्षण पेड़ों की आैसत आयु भी आश्चर्यचकित करने वाली है। यह विलक्षण पेड़ 1200 वर्ष से लेकर 1800 वर्ष तक आयु को आसानी से पूर्ण करते हैं। 'हाइपेरियन" वृक्ष की लम्बाई सामान्यत: एक सौ पन्द्रह मीटर से लेकर एक सौ बीस मीटर तक होती है। व्यास भी कम नहीं होता।
     'हाइपेरियन" का व्यास भी नौ से दस मीटर तक होता है। 'हाइपेरियन" पर्यावरण का अति दुलर्भ प्रजाति के वृक्ष श्रंखला में माना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो हाइपेरियन की खोज करीब एक दशक पहले 25 अगस्त 2006 को पर्यावरणविद एवं प्रकृतिवादी क्रिस अटकिंस एवं माइकल टेलर ने संयुक्त तौर से की थी।
    हालांकि इस विलक्षण वृक्ष की उपलब्धता 1978 में विशेषज्ञों की नजर में आयी थी लेकिन कहीं अधिक महत्व नहीं मिला। सामान्यत: इस लकड़ी का उपयोग परिवेश की सजावट में किया जाता था। करीब सात सौ वर्ष पुराने पेड़ में 18000 से 20000 घनफुट लकड़ी होने का आंकलन रहता है। उत्तरी कैलिफोर्निया में एक तट को सेक्वाइया सेम्परवान्र्स के नाम से जाना जाता है।
   इस क्षेत्र में हाइपेरियन की वृक्ष श्रंखला पायी गयी। पर्यटक हाइपेरियन की विलक्षणता को देखने आते हैं। कई बार तो पर्यटक पेड़ पर चढ़ने से भी नहीं चूकते। कैलिफोर्निया व आसपास के इलाकों में उपलब्ध इस वृक्ष श्रंखला के अधिसंख्य वृक्ष काटे जा चुके हैं।
     विशेषज्ञों की मानें तो 95 प्रतिशत से अधिक वृक्ष कट जाने से यह प्रजाति विलुप्त पर्यावरण श्रंखला में शामिल हो गयी। विशेषज्ञों की मानें तो दुनिया के शीर्ष वृक्ष श्रंखला में हाइपेरियन शीर्ष पर है। हाइपेरियन वृक्ष की लकड़ी सुन्दर, चमकदार, लाल रंग की होती है।
   आशियाना को सौन्दर्य शास्त्र के अनुरुप गढ़ना हो तो हाइपेरियन लकड़ी को श्रेष्ठ एवं उत्तम माना जाता है। लिहाजा हाइपेरियन वृक्ष श्रंखला के सामने अस्तित्व संकट खड़ा हो गया।
     हालांकि कैलिफोर्निया सहित देश-दुनिया के कई इलाकों में हाइपेरियन के वृक्ष पाये जाते हैं। खास तौर से मुख्य मार्गो एवं हाईवे पर यह वृक्ष श्रंखला शोभायमान होती है। इन वृक्षों के आसपास अन्य वृक्षों की तुलना में शीतलता भी कहीं अधिक पायी जाती है। व्यास अधिक होने व ऊंचाई भी अपेक्षाकृत अधिक होने पर वन क्षेत्र अर्थात जंगलों में कई बार आश्रय स्थल के तौर पर भी हाइपेरियन उपयोग होते हैं।

Friday, 17 November 2017

कंबोडिया का टा प्रोहोम : नैराश्य में सौन्दर्य

     'नैराश्य में सौन्दर्य" जी हां, सामान्यत: खण्डर नैराश्य का प्रतीक होते हैं लेकिन ऐसा भी नहीं कि खण्डर में सौन्दर्य न दिखे। बस सलीके से सजाने-संवारने की आवश्यकता होगी। 

    कंबोडिया का 'राजा विहार" मंदिर अपने शिल्प एवं वैशिष्ट्य के कारण विश्व विख्यात हो रहा। हालांकि 'राजा विहार" मंदिर खण्डर की भांति विद्यमान है लेकिन खण्डहर का सौन्दर्य भी दर्शकों-श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को आकर्षित करता है। 
    कंबोडिया के इस विलक्षण मंदिर को 'टा प्रोहोम" के नाम से देश-दुनिया में खास तौर से जाना-पहचाना जाता है। कंबोडिया में 'टा प्रोहोम" का आशय 'पूर्वज ब्राह्मा" होता है। कंबोडिया के सिम रीप प्रांत के अंगकोर में स्थित है। 
   खण्डहर में सामान्यत: नैराश्य प्रतीत होता है लेकिन 'टा प्रोहोम" में ऐसा नहीं है क्योंकि यहां 'नैराश्य में सौन्दर्य एवं लालित्य" का बोध होता है। कंबोडिया का यह मंदिर 12 वीं एवं 13 वीं शताब्दी के मध्य बना। कंबोडिया की बैन शैली पर आधारित यह विलक्षण मंदिर देश-दुनिया में खास ख्याति रखता है। इसे 'राजविहार" भी कहा जाता है।
      विशेषज्ञों की मानें तो कभी मंदिर क्षेत्र शहर का हिस्सा हुआ करता था लेकिन अब वन क्षेत्र का विशिष्ट स्थान है। अब तो मंदिर का कोना-कोना जगंल परिवेश से आबद्ध दिखता है। इस भव्य-दिव्य मंदिर का निर्माण खमेर राजा जय वरामन ने कराया था। अंगकोर के इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर को यूनेस्को ने 1992 में विश्व धरोहर में शामिल किया था।
       भारत एवं कंबोडिया के पर्यटन समझौता के तहत इस मंदिर के सौन्दर्य निखार एवं संरक्षण में भारतीय विशेषज्ञों की भी विशेष भूमिका रहती है। इस मंदिर में मुख्यत: बौद्ध दर्शन होते हैं। बौद्ध अनुयायियों के बीच इसकी मान्यता बौद्ध मठ के तौर पर भी है। इस मंदिर की दिव्यता एवं भव्यता का सहज अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यहां 12500 से अधिक श्रद्धालुओं-दर्शकों एवं पर्यटकों के लिए अपेक्षित एवं पर्याप्त स्थान है।
     विशेषज्ञों की मानें या किवदंती मानें तो इस भव्य-दिव्य मंदिर के निर्माण में आत्माओं का भी सहयोग रहा। आसपास के गांव व अन्य करीब आठ लाख से अधिक आत्माओं का सेवाओं एवं आपूर्ति में सहयोग माना जाता है। मंदिर के लिए श्रम के साथ ही सोना, मोती, रेशम व धन की उपलब्धता भी सुनिश्चित करायी गयी थी। मंदिर में उपग्रह का अंकन है।
    खास तौर से बौद्ध धर्म को रेखांकित किया गया लेकिन राजा की मां, राजा के गुरु, जय मंगलला, बोधिसत्व, लोकेश्वर की करुणा आदि दृश्यांकित है। विशेषज्ञों की मानें तो 15 वीं शताब्दी में खमेर साम्राज्य के पतन के बाद 'टा प्रोहोम" मंदिर को छोड़ दिया गया। सदियों उपेक्षित रहने से मंदिर खण्डर में तब्दील हो गया। अन्तोगत्वा, 21 शताब्दी में अंगकोर के मंदिरों को सुरक्षित-संरक्षित एवं पुर्नस्थापना के सार्थक प्रयास शुरु हुये।
     'टा प्रोहोम" को सौन्दर्य प्रदान करने की इच्छाशक्ति इकोले फ्रांसीज डी एक्सट्रैम ओरियेंट में दिखी। शनै-शनै यह विलक्षण मंदिर उपेक्षा से उबरने लगा। उपेक्षा की अवधि में मंदिर का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका था। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 2013 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मंदिर का गौरव व स्वरूप वापस लाने की कोशिशें प्रारम्भ कीं।
     विशेषज्ञ अन्तोगत्वा, मंदिर के अधिसंख्य हिस्सों को वास्तविक दशा-दिशा में लाने में कामयाब रहे। पर्यटकों की सहूलियतों को ध्यान में रखते हुये लकड़ी के रास्ते, प्लेटफार्म व घुडसवारी के लिए रेलिंग आदि का निर्माण कराया गया।
      मंदिर का क्षेत्रफल करीब साढ़े छह लाख वर्गफुट से अधिक है। यहां एक सुन्दर अभ्यारण भी है। इसे विश्व के शीर्ष बौद्ध स्थलों में से एक माना जाता है।

Thursday, 16 November 2017

कापूचिन कैटाकोम्ब : आश्चर्यजनक किन्तु सत्य

    'आश्चर्यजनक किन्तु सत्य" जी हां, कब्रिास्तान तो देखे सुने जाते हैं लेकिन शव संग्रहालय बहुत कम ही सुना जाना गया।

  इटली में दुनिया का सबसे अजूबा संग्रहालय है। हालांकि संग्रहालय संवेदनशील एवं कमजोर ह्मदय वाले व्यक्तियों को अवलोकन की इजाजत नहीं देता। इस आश्चर्यजनक संग्रहालय को देश-दुनिया में 'कापूचिन कैटाकोम्ब" के नाम से जाना-पहचाना जाता है।
   इसे अनोखा कब्रिास्तान कहा जाये या शव संग्रहालय की संज्ञा दी जाये। विशेषज्ञों की मानें तो सदियों पुराने इस शव संग्रहालय में करीब दस हजार शव संग्रहित हैं। यह एक ऐसा शव संग्रहालय है, जहां शव को ममी बना कर सुरक्षित रखा गया है। 
    इटली के शहर सिसली में स्थित इस शव संग्रहालय को देखने देश दुनिया के असंख्य पर्यटक आते हैं। 'कापूचिन कैटाकोम्ब" शायद दुनिया को विलक्षण एवं अनोखा शव संग्रहालय है। 'कैटाकोम्ब" का शाब्दिक अर्थ अण्डर ग्राउण्ड कब्रिास्तान होता है।
      विशेषज्ञ बताते हैं कि प्राचीन रोम में इस तरह के कब्रिास्तान बहुतायत में पाये जाते थे। लेकिन 'कापूचिन कैटाकोम्ब" काफी हद तक 'कैटाकोम्ब" से अलग है। यहां शव को दफनाने के स्थान पर ममी की भांति सजा-संवार कर सुरक्षित रखा जाता है। 
    यह कब्रिस्तान एक संग्रहालय की भांति है। 'कापूचिन कैटाकोम्ब" में शव को रखने के लिए अलग-अलग सेक्शन अर्थात वर्ग बने हुये हैं। मसलन पुरुष वर्ग, महिला वर्ग, बाल वर्ग,  कुंवारी कन्याओं का वर्ग, संत-महात्माओं का वर्ग, शिक्षक वर्ग, चिकित्सक वर्ग एवं सैनिक-रक्षा विशेषज्ञ वर्ग आदि-इत्यादि हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इस शव संग्रहालय में प्रथम ममी वर्ष 1599 में बनायी गयी थी। 
    यह शव ब्रादर सिल्वेस्ट्रो का था। हालांकि वर्ष 1880 में इस कब्रिास्तान को अधिकृत तौर पर बंद कर दिया गया था। बताते हैं कि बंद होने के बायजूद अक्सर शव को लेकर लोग आते थे। अन्तोगत्वा, एक बार फिर संग्रहालय की हलचल होने लगी। वर्ष 1920 में एक बच्ची का शव आया। इसे ममी बना कर संरक्षित कर लिया गया।
    बच्ची के इस शव अर्थात ममी को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे बच्ची सो रही हो। गहरी निद्रा में हो। यह बच्ची रोसलिया लबाडरे थी। इस ममी को संग्रहालय में 'स्लीपिंग ब्यूटी" नाम दिया गया। यह रहस्य अभी भी कायम है कि बच्ची के शव को ममी बनाने में आखिर कौन सा रसायन उपयोग में लाया गया क्योंकि बच्ची की ममी अभी भी वैसी ही है। 
    विशेषज्ञों की मानें तो 'कापूचिन कैटाकोम्ब" की स्थापना केवल कैथालिक संत-महात्माओं के शव संरक्षित-सुरक्षित रखने के लिए किया गया था लेकिन धीरे-धीरे इस संग्रहालय में शव को ममी के तौर पर रखा जाना सामाजिक प्रतिष्ठा एवं सामाजिक रुतबा माना जाने लगा।
    इस संग्रहालय में मृतक के परिजनों से बकायदा शुल्क वसूला जाता है। जिससे संग्रहालय के रखरखाव का खर्च चले। यदि किसी ममी का शुल्क आना बंद हो जाता है तो उस ममी को संग्रहालय से हटा दिया जाता है। 'कापूचिन कैटाकोम्ब" देश-दुनिया के पर्यटकों के लिए हमेशा खुला रहता है।
    हालात यह हैं कि यह शव संग्रहालय इटली का विशेष आकर्षण बन चुका है। यह शव संग्रहालय अंदर से जितना डरावना लगता है, उतना ही अधिक आकर्षण भी है। हालांकि संग्रहालय तक पहंुचना का रास्ता संकरी गलियों से हो कर गुजरता है। फिर भी शव संग्रहालय में ममियों को देखने बड़ी संख्या में देश विदेश के पर्यटक पहुंचते हैं।

Tuesday, 14 November 2017

माउंट रुश्मोरे : विशिष्ट एवं शिल्प सौन्दर्य

     भले ही कलाकृतियां बहुत अधिक पुरानी-प्राचीन न हों लेकिन अपनी विशिष्टता से एक अलग पहचान बना ही लेती हैं।

    जी हां, युनाईटेड स्टेट्स का 'माउंट रुश्मोरे" भले ही अत्यधिक प्राचीन न हो लेकिन दुनिया का एक आकर्षण है। हालात यह हैं कि देश-दुनिया की कलाकृतियों का उल्लेख हो आैर अमेरिका के 'माउंट रुश्मोरे" का उल्लेख न हो तो कहीं न कहीं कुछ अधूरा सा लगता है। 
    माउंट रुश्मोरे कलाकृति अत्यधिक पुरानी तो नहीं लेकिन विशिष्टता पहचान बन गयी। माउंट रुश्मोरे का निर्माण करीब डेढ दशक में पूर्ण हो सका। 
   इसके निर्माण में सौ-पचास नहीं बल्कि चार सौ से अधिक कुशल कारीगरों ने इसे तराशा-सजाया-संवारा। माउंट रुश्मोरे का निर्माण 4 अक्टूबर 1927 में प्रारम्भ हुआ। इसके निर्माण में करीब डेढ दशक लगे। निर्माण के प्रथम चरण में डाइनामाइट से दर्जनों को चट्टानों का हटाया-तोड़ा या ध्वस्त किया गया।
   इसमें अमेरिका चार पूर्व राष्ट्रपतियों की छवियों को रुपांकित किया गया या उकेरा गया। इनमें जार्ज वाशिंगटन, थॉमस जेफरसन, थियोडोर रुजवेल्ट एवं अब्रााहम लिंकन की छवियां हैं। इस विशाल कलाकृति में पूर्व राष्ट्रपतियों के भव्य-दिव्य चेहरे दिखते हैं।
      साउथ डकोटा में कीस्टोन के समीप स्थित 'माउंट रुश्मोरे" नेशनल मेमोरियल गुलजोन बोरग्लम द्वारा निर्मित स्मारक है। यह एक ग्रेनाइट मूूर्तिकला है। इसे संयुक्त राज्य अमेरिका स्मारक भी कहा जाता है। स्मारक खास तौर से छवियों की उंचाई 18 मीटर से भी अधिक है। 
   'माउंट रुश्मोरे" मुख्यत: ग्रेनाइट चेहरों वाली एक अतिसुन्दर मूर्तिकला है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कीस्टोन ब्लैक हिल्स में रुपांकन किया गया। गुटजोन बोरग्लम व उनके पुत्र लिंकन बोर्लुम के संयुक्त प्रयासों का एक शानदार परिणाम है। दक्षिण डकोटा के प्रसिद्ध इतिहासकार डोअनी रॉबिन्सन ने क्षेत्र को पर्यटन के तौर पर बढ़ावा देने के लिए ब्लैक हिल्स को अपने तौर-तरीके से रेखांकित किया। इसकी नक्काशी का श्रेय रॉबिन्सन को जाता है।
     रॉबिन्सन का मूर्तिकला में भी अच्छा दखल था। ग्रेनाइट की खराब गुणवत्ता के बावजूद विशेषज्ञों ने विशेष बना दिया। 'माउंट रुश्मोरे" को महान राजनीतिक संरक्षक स्थल के तौर पर भी अभिलेखों में दर्ज किया गया है। अमेरिका के सीनेटर पीटर नोरैक के कार्यकाल में इस प्रसिद्ध एवं विशालकाय मूर्तिशिल्प का खाका खींचा गया। स्मारक का निर्माण सामान्यत: 1927 में प्रारम्भ हुआ।
   छवियों के चेहरों का निर्माण 1934 से 1939 के बीच पूरा हो सका। निर्माणकर्ता गुटजोन बोरग्लम की मौत मार्च 1941 में होने के बाद उनके पुत्र लिंकन बोर्लुम ने निर्माण कार्य पूर्ण कराया। अन्तोगत्वा, 'माउंट रुश्मोरे" संयुक्त राज्य अमेरिका का एक शानदार प्रतीक बन गया।
    विशेषज्ञों की मानें तो देश-दुनिया के दो लाख से अधिक पर्यटक प्रति वर्ष 'माउंट रुश्मोरे" के शिल्प सौन्दर्य देखने आते हैं।

Thursday, 9 November 2017

मान्यता-परम्परा : हवा में लटकते शव

   'परम्पराओं एवं मान्यताओं" का कहीं कोई अंत नहीं। जी हां, देश-दुनिया में अजीब-ओ-गरीब मान्यतायें एवं परम्परायें देखने-सुनने को मिलती हैं।

  अभी तक हैंगिंग टेम्पल, हैंगिंग फ्लाईओवर-ओवरब्रिाज, हैंगिंग रेस्ट्रां, हैंगिंग हाउस, हैंगिंग गार्डन आदि-अनादि सुुुना होगा लेकिन हैंगिंग कॉफिन नहीं सुना होगा लेकिन दुनिया में यह भी परम्परा है कि ताबुत (कॉफिन) को पहाड़ की चोटी पर लटकाया जाये।
    आम तौर पर शव का अंतिम संस्कार करने से लेकर जमीन या कब्रिस्तान में दफन करने की व्यवस्थायें-परम्परायें देखते सुनते आये हैं लेकिन शव को ताबुुत में रख कर हवा में लटकाना नहीं सुना होगा। 
     दुनिया के कई देशों में समुदायों के बीच परम्परा है कि शव को ताबुत में रख कर पहाड़ पर लटका दिया जाये। बताते हैं कि दुनिया में यह परम्परा करीब दो हजार वर्ष पुरानी है। मान्यता है कि पहाड़ों पर शव रखने से मृत व्यक्ति का अस्तित्व आसानी से प्रकृति की आबोहवा में मिल जाता है।
    हैंगिंग कॉफिन्स की परम्परा खास तौर से दुनिया के तीन देशों में देखने-सुनने को मिलती है। चीन, इण्डोनेशिया एवं फिलीपींस में यह परम्परा लम्बे समय से चली आ रही है। फिलीपींस के सगाधा में यह परम्परा सदियों से चली आ रही है।
     चीन में यांगटजी नदी के किनारे हैंगिंग काफिंस देखने को मिल जाते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो यह ताबुत मिंग राजवंश काल के हैं। किसी समय इस स्थान पर कॉफिन्स एक हजार से भी अधिक थे लेकिन अभी धीरे-धीरे यह संख्या काफी कम हो गयी है।
    हालांकि अब इन कॉफिन्स को संरक्षित कर दिया गया है। इस स्थान को अब पर्यटन स्थलों की भांति मान्यता दी गई है। चीन के ताबुत बेहद खतरनाक तौर-तरीके पर दिखते हैं। आश्चर्य होता है कि आखिर ताबुत को इन खतरनाक स्थल पर कैसे रखा गया ? फिलीपींस में तो कुछ अलग ही परम्परा है। 
  फिलीपींस के बुजुर्ग मृत्यु से पहले ताबुत को खुद तैयार करते-कराते हैं। परिजनों को अपनी भावनाओं से अवगत करा देते हैं कि उनकी इच्छा के मुताबिक शव को ताबुत में रख कर हवा में लटकायें। जिससे उनके शरीर का अस्तित्व प्रकृति की गोद में समविष्ट हो जायें।
    मृत्यु के पश्चात शव को उसमें रख कर पहाडी गुफा में रख दिया जाता है। इण्डोनेशिया के सुलावेसी में भी इस तरह की मान्यतायें एवं परम्परायें मिलती हैं। इसी तरह की मान्यतायें परम्परायें दुनिया के कई देशों में देखने-सुनने को मिलती हैं।

Wednesday, 8 November 2017

ब्लू होल : मनोरंजकता में भी खतरा

  'सौन्दर्य शास्त्र" का कथ्यात्मक तथ्यात्मक आलोक निश्चय ही किसी को भी लुभाने में समर्थ कहा जाएगा। प्राकृतिक सौन्दर्य जहां एक ओर मन-मस्तिष्क को प्रफुल्लित करता है तो वहीं इसमें खतरे भी कम नहीं। लाल सागर मिरुा तट पर प्राकृतिक सौन्दर्य का नायाब स्थल है। 

 इस स्थल को ब्लू होल के नाम से दुनिया में जाना-पहचाना जाता है। गोताखोर समुदाय का यह एक अति पसंदीदा स्थल है लेकिन ब्लू होल गोताखोरों के लिए बेहद खतरनाक भी माना जाता है।
  देश दुनिया के तमाम पर्यटक इस स्थल पर गोतोखोरी देखने जाते हैं। इसे 'दुनिया के सबसे खतरनाक गोता स्थल" व 'गोताखोर के कब्रिास्तान" के तौर भी जाना जाता है। 
   करीब सौ मीटर गहराई वाले इस ब्लू होल में करीब तीस मीटर लम्बी सुरंग भी है। हालांकि इसका प्रवेश स्थल करीब छह मीटर चौडा़ई वाला है। सुरंग को कट्टर के रुप में जाना जाता है। 
    इस इलाके में मंूगा व चट्टानी मछली की उपलब्धता बहुतायत में है। मिरुा शासन ने इस स्थल पर खास तौर से गाइड्स व प्रशिक्षित कर्मचारी तैनात किए हैं जिससे किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना को रोका जा सके। हालांकि मनोरंजक ड्राइविंंग के लिए बड़ी तादाद में गोताखोर यहां आते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अति गहराई में नाइट्रोजन रसायन का प्रभाव मिलता है।
      नाइट्रोजन का प्रभाव गोताखोरों के लिए बेहद खतरनाक होता है क्योंकि इससे गोताखोरों में शराब का नशा जैसा होने लगता है। नशा का प्रभाव शरीर में होते ही गोताखोरों का फिर बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में गोताखोर की मौत हो जाती है।
     ब्लू होल बेहद आकर्षक अर्थात मेहराब जैसा काफी कुछ प्रतीत होता है। ब्लू होल की गहराई में धीरे-धीरे गैसों के मिश्रित प्रभाव से गोताखोर को नींद आने लगती है। बस गोताखोरों की मौत के यही कारण होते हैं। हालांकि शासकीय गाइड्स निश्चित सीमा से अधिक आगे जाने के इजाजत नहीं देते हैं।
      फिर भी गोताखोर जोश व मनोरंजकता में निश्चित दायरे से कहीं आगे बढ़ जाते हैं। जिससे हादसे हो जाते है। मिरुा के शासकीय अफसरों की मानें तो अब तक सौ से अधिक गोताखोर मौत का शिकार हो चुके हैं। मौतों को देख कर मिरुा शासन ने एहतिहाती उपाय किए हैं।
    ऐसा नहीं कि इस क्षेत्र में जीवाश्म (जीव-जन्तु) भी बड़ी तादाद में पाए जाते हैं। मगरमच्छ व कछुओं की तादाद कहीं अधिक होती है। इस क्षेत्र में रसायनिक पदार्थों की उपलब्धता भी पर्याप्त मात्रा में है। खास बात यह है कि ब्लू होल का जल कहीं मीठा तो कहीं खारा है।

Friday, 3 November 2017

विलक्षण रीड बांसुरी गुफा

    'प्राकृतिक उपहार श्रंखला" से देश दुनिया लबरेज है। यह प्राकृतिक श्रंखला दर्शकों एवं पर्यटकों को अपनी विलक्षणता से न केवल आकर्षित करती है बल्कि मन-मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ देती है। जिससे दर्शक एवं पर्यटक लम्बे समय तक भूल नहीं पाते।

   चीन के गुइलिन में एक विलक्षण गुफा है। इस बहुरंगी गुफा का अवलोकन करने या देखने देश दुनिया के दर्शक या पर्यटक बड़ी संख्या आते-जाते रहते हैं। देश दुनिया के पर्यटकों के आकर्षण के इस केन्द्र को रीड बांसुरी गुफा (रीड फ्लूट केव) के नाम से जाना जाता है। 
  यह दिलचस्प गुफा बहुरंगी प्रकाश से हमेशा आलोकित रहती है। इसके लिए प्रकाश की कहीं कोई अतिरिक्त व्यवस्था नहीं है बल्कि शिला खण्ड अर्थात पत्थर श्रंखला की चमक से गुफा आलोकित रहती है। गुफा में अनवरत बहुरंगी-इन्द्रधनुषी प्रकाश की किरणें परिवेश में तैरती रहती हैं।
    इस गुफा में लाइमस्टोन (चूना पत्थर) की एक लम्बी श्रंखला है। खास बात यह है कि इन पत्थर श्रंखला से निकलने वाला प्रकाश विभिन्न रंगों वाला होता है। इतना ही नहीं गुफा में मधुरता व सुरीलापन का भी एहसास होता है कि जैसे गुफा में बांसुरी की मधुर तान-मधुर राग की अठखेलियां हो रही हों। करीब पांच सौ मीटर से अधिक लम्बी यह गुफा अपने अंदर अनेक आकर्षण छिपाये है।
     विशेषज्ञों की मानें तो यह विलक्षण गुफा एक हजार दो सौ वर्ष से भी अधिक पुरानी है। गुफा में शिला खण्ड की विलक्षण व अद्भूत आकृतियां भी अवलोकित होती हैं। यह कलाकृतियां कलात्मकता से परिपूरित हैं। इसमें रॉक संरचनाओं की विशिष्टता दिखती है। इनमें सत्तर से अधिक शिलालेख शामिल हैं। जिसमें चीन के तांग राजवंश का उल्लेख मिलता है। 
    विशेषज्ञों की मानें तो यह प्राचीन शिलालेख गुइलिन की विशिष्टताओं को भी दृश्यांकित करते हैं। यह विलक्षण एवं अदभूत गुफा करीब पौन सौ वर्ष पहले सन 1940 में प्रकाश में आयी। बताते हैं कि कभी जापानी सैनिकों के समूह ने इस स्थान पर शरण ली थी।
     इसके बाद धीरे-धीरे यह गुफा देश दुनिया में दर्शकों एवं पर्यटकों के बीच आकर्षण का केन्द्र बन गयी। चीन के शीर्ष पर्यटन स्थलों में रीड बांसुरी गुफा को जाना जाता है।

Thursday, 2 November 2017

दुनिया का नायाब अमेरिका का गोल्डन गेट ब्रिज

     वास्तुकला की बात हो या नक्कासी या फिर विकास की फर्राटा दौड़ हो... दुनिया में नायाब आयाम गढ़ने में कोई देश किसी से पीछे नहीं। 

 नदियों व नहरों पर झूला पुलों की देश-दुनिया में एक लम्बी श्रंखला है लेकिन अमेरिका का गोल्डन गेट ब्रिज (सेतु) अपनी विलक्षणताओं के कारण दुनिया में अपनी एक अलग ही पहचान रखता है। 
    कुल करीब 2737 मीटर लम्बाई वाला यह झूला पुल अब अपनी आयु के करीब अस्सी वर्ष पूर्ण करने वाला है। इस झूला पुल का विधिवत उद्घाटन 27 मई 1937 को हुआ था। यह झूला पुल अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को को कई इलाकों व मुख्य महामार्गों से जोड़ता है। सैन फ्रांसिस्को खाड़ी के दोनों किनारों को जोड़ता है।
     विशेषज्ञों की मानें तो निर्माणकाल में इस झूला पुल को दुनिया का सबसे लम्बा झूला पुल माना गया था। यह अमेरिका के एक सौ एक महामार्गों को जोड़ता है। सिक्स लेन की चौड़ाई वाले इस पुल पर एक साथ सैकड़ों वाहन फर्राटा भरते हैं। करीब नब्बे फुट इस पुल की चौड़ाई है। 
     जबकि ऊंचाई 227 मीटर से भी अधिक है। इसके निर्माण में लाखों टन लौह का विभिन्न तौर तरीके से इस्तेमाल किया गया। डिजाइन भी अद्भूत है। सैन फ्रांसिस्को, कैलीफोर्निया व मैरीन काउंटी सहित कई क्षेत्रों के लिए यह विशेष विकास का आयाम है।
   सांझ ढ़लते ही गोल्डन गेट ब्रिाज व आसपास का इलाका रोशनी की चकाचौंध से जगमगा उठता है। सैन फ्रांसिस्को एवं कैलिफोर्निया के लिए यह एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न बन चुका है। सांझ होने के साथ ही खाड़ी का जल भी उछाल मारता है। 
   कई बार तो खाड़ी का जल-पानी उछाल मार कर पुल तक भी पहंुच जाता है लेकिन यह जल क्रीड़ा भी यात्रियों-राहगीरों व पर्यटकों को आंनदित करती है। हालांकि सामान्य जल स्तर से इस पुल की ऊंचाई अर्थात नीचे का हिस्सा करीब 67 मीटर ऊंचा है। 
   पुल के नीचे से जल यातायात भी निरन्तर चलता रहता है। झूला पुल पर चकाचौंध रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था है। डिजाइन ऐसा है कि खाड़ी की जलक्रीड़ा का लाइटिंग सिस्टम पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात जनजीवन को कोई खतरा नहीं रहता।
  दुनिया के इस विशालतम झूला पुल की कल्पना-परिकल्पना सस्पेंशन, ट्रस आर्क एवं टअस काजवेज ने की थी।
  इस पुल के अनुरक्षण का कार्य गोल्डन गेट ब्रिाज हाईवे एण्ड ट्रांसपोर्ट के हवाले है। यह विकास का एक आयाम भर ही नहीं बल्कि एक पर्यटन स्थल भी है। देश-दुनिया से बड़ी संख्या में पर्यटक इस पुल का सौन्दर्य निहारने आते हैं।

Friday, 27 October 2017

रेसट्रैक प्लाया : प्राकृतिक सौन्दर्य पर बेहद खतरनाक

  सामान्यत: प्रकृति की गोद में सौन्दर्य का बोध होता है लेकिन दुनिया के असंख्य स्थल इस मिथक या भ्रम को तोड़ते दिखते हैं।

    जी हां, अमेरिका रेसट्रैक प्लाया दुनिया का सबसे खतरनाक स्थान माना जाता है। सामान्यत: इसे दुनिया में डेथ वैली के तौर पर पहचाना-जाना जाता है। 
   दुनिया के सबसे गर्म स्थानों में शुमार होने वाले 'रेसट्रैक प्लाया" में कहीं कोई जन-जीवन नहीं है। 'रेसट्रैक प्लाया" तो छोडिए आसपास भी कहीं कोई जनजीवन नहीं दिखता। यहां कहीं कुछ यदि चलायमान है तो 'पत्थर" । 
   जी हां, सौन्दर्य बोध से परिपूरित 'रेसट्रैक प्लाया" में पत्थर स्वत: चलायमान होते हैं। रेसट्रैक प्लाया डेथ वैली में मौजूद पत्थर श्रंखलाओं को कभी एकल तो कभी समूह में चलते देखा व महसूस किया जा सकता है। यह दशा-दिशा अचरज-अजूबा या आश्चर्य से कम नहीं लेकिन यह हकीकत है। अमेरिका का रेसट्रैक प्लाया डेथ वैली देश-दुनिया में चर्चा एवं कौतुहल का विषय बना हुआ है।
   यह डेथ वैली अमेरिका का एक अतिविशालतम रेगिस्तान है। यह पूर्वी कैलिफोर्निया इलाके में आता है। यह मोजावे रेगिस्तान का हिस्सा है। उत्तरी अमेरिका के सबसे निचले शुष्क एवं गरम स्थानों में से एक है। समुद्र तल से करीब 282 फुट नीचे आंकलित यह इलाका अपनी विशिष्टताओं के कारण ख्याति रखता है। विशेषज्ञों की मानें तो डेथ वैली पश्चिमी गोलार्ध में सर्वाधिक तापमान का रिकार्ड रखता है। 
  खास यह है कि पत्थर श्रंखला तापमान के दबाव एवं रसायनिक कारणों से स्वयं कम्पित एवं चलायमान होती है। कई बार यह पत्थर श्रंखला या एकल पत्थर हमलों की मुद्रा में आ जाते हैं। ऐसा तापमान के दबाव एवं रसायनिक कारणों से होता है।
     ऐसे में बचाव करना असंभव हो जाता है। लाजिमी है कि पत्थरों के हमलों से जान जोखिम में पड़ जाती है। कैलिफोर्निया एवं नेवादा की सीमा वाले इलाके में स्थित यह डेथ वैली अपने आगोश में प्रकृति का सौन्दर्य में समेटे है।
    इस डेथ वैली को अमेरिका में नेशनल पार्क का दर्जा भी हासिल है। पूर्व दिशा में अमार्गोसा रेंज है तो पश्चिम में पैनामिंट रेंज है। सिल्वानिया एवं आउल्सहेड की पर्वत श्रंखला भी उत्तर एवं दक्षिण सीमाओं पर है। करीब 7800 वर्ग किलोमीटर के दायरे वाले इस खतरनाक डेथ वैली को देश-दुनिया के बाशिंदे नजदीक से देखने की इच्छा रखते है लेकिन खतरों को भांप कर दूर ही रहना मुनासिब समझते हैं। 
     विशेषज्ञों की मानें तो डेथ वैली में पत्थरों की शक्ल में 'सॉल्ट पैन्स" फैले हुये हैं। डेथ वैली में यह 'सॉल्ट पैन्स" रसायनिक एवं प्राकृतिक देन है। भूवैज्ञानिकों की मानें तो यहां कभी झीलों का इलाका था लेकिन समुद्री झीलों का यह इलाका धीरे-धीरे सूखता गया। काफी लम्बे समय में यह रेगिस्तान में तब्दील हो गया।

Thursday, 26 October 2017

शिजुओ के गौतम बुद्ध : विश्व के विशालतम

   शिजुओ की पहाड़ी पर 'आश्चर्य" की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। 'आश्चर्यजनक किन्तु सत्य" जी हां, चाइना की शिजुओ की पहाड़ी अपनी खूबियों के लिए देश-दुनिया में विख्यात है।

   इन खूबियों व आश्चर्यजनक कलाकृतियों में भगवान गौतम बुद्ध की विशाल प्रतिमा विद्यमान है। विशेषज्ञों की मानें तो 'लेशान के विशालकाय बुद्ध" दुनिया के विलक्षण बुद्ध हैं। चाइना के लेशान की पहाड़ियों में पत्थर पर उत्कीर्ण भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिमा करीब 71 मीटर अर्थात 233 फुट ऊंची है। 
     इस विशालकाय प्रतिमा को आठवीं शताब्दी में तैयार किया गया था। प्रतिमा की बनावट ऐसी है, जैसे प्रतिमा तीन नदियों को निहार रही हो। इसका चेहरा माउंट एमेई की तरफ है।
     माउंट एमेई बौद्ध धर्मावावलम्बियों का अति पवित्र धार्मिक स्थल है। निर्माण के समय इस स्थान पर तेरह मंजिला लकड़ियों का एक ताकतवर स्ट्रक्चर बनाया गया था। यहां सोने का मढ़ाव भी है। युआन राजवंश के शासनकाल में मंगोल आक्रमणकारियों ने इसे नष्ट कर दिया था। 
     लेशान की यह विशाल प्रतिमा आसन में विद्यमान है। चेहरे पर सौम्यता तो शारीरिक बलिष्ठता परिलक्षित होती है। यह तीन नदियों के संगम स्थल पर विद्यमान है। यह तीन नदियां मिन नदी, क्वीनगई नदी व दादू नदी हैं। संगम का यह स्थान चाइना के लेशान शहर में है। यह सिचुआन प्रांत के पूर्व में है। 
     देश दुनिया के प्राकृतिक सौन्दर्य वाले स्थानों में जाना जाता है। वर्ष 1996 के दिसम्बर में यूनेस्को ने भगवान गौतम बुद्ध के इस स्थान को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया है। विशेषज्ञों की मानें तो इस प्रतिमा का निर्माण 90 वर्ष से भी अधिक समय में पूर्ण हो सका। निर्माण में असंख्य कारीगरों ने सहयोग किया था। 
    दुनिया की यह सबसे बड़ी बुद्ध प्रतिमा के तौर पर पहचान रखती है। खास यह है कि पत्थर पर खुदाई से संरचित इस प्रतिमा के साथ ही स्थल पर बौद्ध धर्म की कविता, गीत व कहानी भी चित्रित हैं। यह अति शांतिपूर्ण स्थल है। यह प्रतिमा 233 फुट ऊंची है तो ऊंगलियां लगभग 27 फुट की हैं। कंधों की चौड़ाई 24 मीटर अर्थात 79 फुट है। 
    विशेषज्ञों की मानें तो इस धार्मिक एवं कलात्मक परियोजना की शुरुआत एक साधु हाई टॉग ने की थी। साधु ने भावनाओं के अनुरूप इस स्थल का चयन प्रतिमा के लिए किया तो पूरी शिद्दत से निर्माण भी पूर्ण हुआ। साधु ने परियोजना का कार्य प्रारम्भ कराया लेकिन पूूर्ण नहीं करा सका लेकिन बाद में साधु हाई टॉग के शिष्य श्रंखला ने इस परियोजना को पूर्ण आकार दिलाया था। 
    इसमें 90 वर्ष का परिश्रम समाहित है। यह स्थापत्य कला का विश्व का अनुकरणीय उदाहरण है। इसमें वास्तुशास्त्र भी दृष्टिगत होता है तो वहीं कौशल्य भी वैशिष्टय स्थान रखता है। जलनिकासी के पर्याप्त प्रबंध दिखते हैं। दुनिया में इसकी खास ख्याति है।
       बुद्ध प्रतिमा के नवीकरण के लिए देश दुनिया ने व्यापक स्तर पर ध्यान दिया। चाइना सरकार ने लगभग 1963 में मरम्मत का कार्य प्रारम्भ किया था जिससे रखरखाव न होने के कारण क्षतिग्रस्त हुए हिस्से का सुधार किया जा सके। अब रखरखाव यूनेस्को के विशेषज्ञों की देखरेख में किया जाता है।  

Wednesday, 25 October 2017

स्नेक आइलैण्ड : सांपों की सल्तनत

 'सांपों की सल्तनत" जी हां, दुनिया में एक स्थान ऐसा भी है, जहां सांपों की सल्तनत अर्थात हुकूमत चलती है। आश्चर्य ही होता है कि कहीं पशु-पक्षियों-जीव-जन्तुओं की हुकूमत हो। 

  यह कोई कपोल कल्पना या किवदंती नहीं बल्कि हकीकत है। ब्राजील दुनिया में अपनी खूबसूरती-सौन्दर्य के लिए जाना जाता है लेकिन ब्रााजील की धरती पर जहरीलापन भी कम नहीं। ब्राजील का 'स्नेक आइलैण्ड" असंख्य सर्प प्रजातियों से अच्छादित है।
    धरती हो या पेड़-पौधे सभी स्थान पर सांप-सर्प मिल जायेंगे। दुनिया की शायद ही कोई सर्प प्रजाति हो जो यहां न मिले। सांप खतरनाक भी आैर खूंखार भी। खंूखार ऐसे जिसे देख कर ही इंसान की मौत हो जाये। खतरनाक ऐसे जिसके दंश से पल-दो पल की ही जिन्दगी शेष रहे। 
    विशेषज्ञों की मानें तो साओ पौलो से करीब 93 मिल दूर यह एक समुद्री टापू है। इसे ब्राजील सहित दुनिया में 'स्नेक आइलैण्ड" के नाम से जाना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो इस 'स्नेक आइलैण्ड" में सर्प संख्या का घनतत्व अत्यधिक है। आैसत हर वर्ग मीटर में पांच से छह सर्प पाये जाते हैं।
    हालात यह हैं कि एक बेड के स्थान पर छह से आठ या दस सांप आसानी से पाये जाते हैं। स्नेक आइलैण्ड के सर्प अत्यंत जहरीले अर्थात दुनिया के सबसे जहरीले सांपों में गिने जाते हैं। सर्प दंश से कोई भी व्यक्ति बमुश्किल दस से पन्द्रह मिनट जिन्दा रह पाता है।
    विशेषज्ञों की मानें तो ब्राजील में होने वाली मौतों के लिये सर्प दंश ही मुख्य कारक है। ब्राजील में 90 प्रतिशत मौतें तो सर्प दंश से होती हैं। इस आइलैण्ड का क्षेत्रफल करीब साढ़े चार लाख वर्गमीटर है। सांपों की संख्या बीस लाख से अधिक आंकलित है। इनको गोल्डन पिटवाइपर सांप के तौर पर जाना जाता है। 
   इस आइलैण्ड में शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां सांप न हो। कहीं जमीन पर सांप चलते दिखेंगे तो कहीं पेड़ पर लटके दिख जायेंगे तो कहीं चट्टान में छिपे होंगे। हालांकि ब्राजील प्रशासन की ओर इस विलक्षण टापू में आम व्यक्तियों का प्रवेश पूूर्णतय: वर्जित है।
    ब्राजीलियन नेवी ने क्षेत्र को प्रतिबंधित कर रखा है लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई इस आइलैण्ड में नहीं जाता। सर्प विशेषज्ञ एवं शोधार्थी निरन्तर 'स्नेक आइलैण्ड" आते-जाते है तो कुछ प्रवास भी करते हैं। सामान्तय इस आइलैण्ड में किसी के जाने की हिम्मत नहीं पड़ती। 
    इस आइलैण्ड का नाम 'इलहा डी क्विमाडा ग्रांड" है लेकिन सामान्यत इसे 'स्नेक आइलैण्ड" के नाम से जाना जाता है। यह पूरा क्षेत्र बंजर, चारागाह व चट्टानों से आच्छादित है। इस आइलैण्ड में इल्हा दा वनस्पति प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
    वनस्पतियों के साथ साथ पक्षियों की दर्जनों प्रजातियां कोलाहल करती रहती हैं। खास यह है कि पशु-पक्षियों व वनस्पतियों तथा सांपों की आबादी को एक दूसरे से कहीं कोई खतरा नहीं। यह वन क्षेत्र वर्षा क्षेत्र के लिए भी जाना जाता है। स्नेक आइलैण्ड के चौतरफा समुद्री क्षेत्र होने के कारण शीतलता की अनुभूति होती है।

Tuesday, 24 October 2017

आस्ट्रेलिया की मुर्रे नदी : विलक्षण खनिज सम्पदा

     आस्ट्रेलिया की 'मुर्रे नदी" दुनिया के अद्भूत खनिज भण्डारण के लिए ख्याति प्राप्त है। खनिज सम्पदा की बात हो या फिर जलजीवन को संरक्षित करने का विषय हो.... 'मुर्रे नदी" का कहीं कोई सानी नहीं। 

   लाल पत्थरों के शिलाखण्डों पर प्रवाहित यह नदी वैसे तो आस्ट्रेलिया की लाइफ लाइन मानी जाती है लेकिन वहीं दुनिया की शीर्ष एवं बड़ी नदियों में श्रंखलाबद्ध है। करीब 3750 किलोमीटर लम्बी 'मुर्रे नदी" को भी जलीय परिवर्तन के दंश झेलने पड़े। 
   सागर में विलय होने से पहले आस्ट्रेलिया की इस विलक्षण नदी का जल कभी मीठा तो कभी साधारण हो जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो पर्यावरणीय एवं आैषधीय पौधों का प्रभाव सीधे नदी के जल पर पड़ता है। पर्यावरणीय एवं आैषधीय पेड़-पौधों के घषर्ण से जल के स्वाद में परिवर्तन स्वाभाविक है।
     आस्ट्रेलिया के ऊंचे व शीर्ष पहाड़ों के बीच से गुजरने वाली 'मुर्रे नदी" विक्टोरिया, न्यू साउथ वेल्स, दक्षिण आस्ट्रेलिया के क्वींसलैण्ड आदि इलाकों को आच्छादित करती है। विशेषज्ञों की मानें तो मुर्रे नदी को आस्ट्रेलिया में स्वादिष्ट एवं स्वास्थ्यवर्धक खाद्य कटोरा के तौर पर माना जाता है। 
    कारण इस नदी में मछलियों की असंख्य एवं विलक्षण प्रजातियां उपलब्ध हैं। आस्ट्रेलिया के 58 प्रतिशत कृषि क्षेत्र की सिंचाई मुर्रे नदी व इसकी सहायक नदियों से होती है। दुनिया की प्रसिद्ध मछलियां इस विलक्षण नदी की रौनक एवं शोभा हैं। मछलियों की प्रजातियों में मर्रे कॉड, ट्राउंड कॉड, गोल्डन बसेरा, मैक्वेरी बसेरा, चांदी बसेरा, भूरी ट्राउट, मछली पूंछ कैटफिश, आस्ट्रेलिया गलाना, क्रेफिश, झींगा आदि हैं तो वहीं चूहों की विलक्षण प्रजातियां इस नदी में पायी जाती हैं। 
     चूहों की यह प्रजातियां जल अर्थात पानी में ही रहती हैं। नदी का जल सामान्य तो तलहटी लाल रंग की दिखती है। आस्ट्रेलिया में इसे देश की सांस्कृतिक नदी की तरह मान्यता है। कारण यह लाइफ लाइन के साथ साथ खनिज व जलजीवन का पर्याप्त रुाोत है। 
    आस्ट्रेलिया में इसे मुर्रे डार्लिंग के नाम से जाना-पहचाना जाता है। नदी को भी संक्रमण के झटके लगे लेकिन 90 प्रतिशत निदान हो गया। इसे आस्ट्रेलिया में एक प्राकृतिक चमत्कार के तौर पर देखा जाता है। खास यह है कि नदी का एक किनारा अधिसंख्य इलाकों में लाल पत्थर श्रंखला से लबरेज दिखता है तो दूसरा किनारा पर्यावरण से भरपूर दिखता है।
     नदी के किनारों में प्राचीन जीवाश्म चूना पत्थरों का अपार भण्डारण है। आस्ट्रेलिया में इस खनिज सम्पदा का कहीं कोई अंत नहीं। यूं कहा जाये कि मुर्रे नदी आस्ट्रेलिया का सौन्दर्य है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।

Monday, 23 October 2017

वाटर स्पाउट्स : विलक्षणता का एक आयाम

    जल केवल जीवन ही आनन्द का परिचायक भी है। साफ सुथरा पानी पियेंगे तो प्यास बुझेगी। शारीरिक आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति होगी लेकिन पानी की अठखेलियां तन-मन-मस्तिष्क प्रफुल्लित-पुलकित अवश्य होगा। मशीनी रैन डांस-मशीनी वाटर डांस तो मेगाटाउन्स में देखने को मिल जायेंगे लेकिन नेचुरल वाटर डांस देखने के लिए नेचर की गोद में ही जाना होगा।

 'वाटर स्पाउट्स" से ख्याति जल नृत्य अर्थात वाटर डांस नीदरलैण्ड, आस्ट्रेलिया व कतर आदि में देखे जा सकते हैं लेकिन फ्लोरिडा का वाटर स्पाउट्स विलक्षण है।
      सामान्यत: धूूली बवंडर भयभीत करने वाले अथवा डरावने होते हैं लेकिन फ्लोरिडा के जल बवंडर रोमांचित करने वाले होते हैं। इसे जल स्तम्भ, जलव्रज, जलवज्र, बवंडर या चक्रवात कुछ भी कह सकते हैं। यह जल से बने स्तम्भ के आकार के दिखते हैं। मुख्यत: इस तरह के जलस्तम्भ यूरोप एवं अंटार्कटिका में बनते-बिगड़ते दिखते हैं।
    दुनिया के अन्य देशों व अन्य स्थानों पर भी दिखते हैं किन्तु अत्यंत मुश्किल से। फ्लोरिडा में 'वाटर स्पाउट्स" समुद्री इलाके में आम हैं। 'वाटर स्पाउट्स" किसी भी क्षण में मनमोह लेते हैं। कहीं यह तीन चरणों में होता है तो कहीं पांच चरणों में दिखता है।
    'वाटर स्पाउट्स" एक गोला अंधकार से युक्त होता है तो दूसरा गोला घूमता सा प्रतीत होता है। एक अन्य में यह अंगूठी की भांति दिखता है। एक अन्य में यह एक जल स्तम्भ के शक्ल में दिखता है। अन्तत: कुछ पलों में यह सब विलुप्त हो जाता है।
    'वाटर स्पाउट्स" करीब दो किलोमीटर के दायरे में दिखते हैं। हालांकि यह दायरा कम या अधिक भी हो सकता है। जलवायु परिवर्तन या अनुकूल वातावरण का प्रभाव भी 'वाटर स्पाउट्स" पर पड़ता है। खास बात यह है कि 'वाटर स्पाउट्स" में बवंडर जैसे गुण नहीं होते। यह सूखे मौसम में भी बनते हैं। 
   हालांकि इनका जीवन चक्र अत्यधिक लघु अर्थात बीस मिनट के आसपास ही होता है। यह एक प्रकार से बादलों के आवेग-आवेश से बनते हैं। बादलों का आवेग नीचे आने लगता है तो जल अर्थात पानी की क्रिया अथवा क्रीड़ा दिखने लगती है।
   मुख्यत: यह जल वाले क्षेत्रों में ही बनते बिगड़ते हैं। कारण जल को आसानी से घूमने का मौका मिल जाता है। फ्लोरिडा के जलवायु में 'वाटर स्पाउट्स" निरन्तर दिखते हैं।

Wednesday, 18 October 2017

इग्वाजू नदी : पौने तीन सौ झरनों की श्रंखला

   'सौन्दर्य का खजाना" निश्चय ही मन-मस्तिष्क को तारो-ताजा एवं प्रफुल्लित कर देता है। देश-दुनिया में प्राकृतिक खजाना की कहीं कोई कमी नहीं।

   देश-दुनिया के लिए यह जहां एक ओर राजस्व का बड़ा माध्यम है तो वहीं दूसरी ओर पर्यटकों के विशेष आकर्षण के केन्द्र भी हैं। इनमें अद्भूत एवं विलक्षणता से परिपूरित दृश्य मन को लुभाते हैं। अर्जेंटीना एवं ब्रााजील सीमा की 'नदी इग्वाजू" अपने प्राकृतिक सौन्दर्य से देश-दुनिया के आकर्षण का केन्द्र बनी है। देश-दुनिया के लाखों पर्यटक इस नदी की विलक्षणता की एक झलक पाने के लिए लालायित दिखते हैं। 
   दुनिया के सात प्राकृतिक चमत्कारों में   'इग्वाजू नदी" भी शामिल है। नदी के झरनों को देख कर कौतुहल होता है कि आखिर यह भी है ?। नदी क्षेत्र में एक स्वप्न सा लगता है क्योंकि एक साथ एक स्थान पर पौने तीन सौ झरनों को गिरते देखना किसी स्वप्न से कम नहीं लगता। झरनों का यह समूूह करीब तीन किलोमीटर के दायरे में फैला है।
    एक साथ झरनों के समूह-श्रंखला को देखना किसी रोमांच से कम नहीं होता। वर्ष 1986 में झरनों की इस श्रंखला को यूनेस्को ने वल्र्ड हेरिटेज क्षेत्र घोषित किया है। झरनों के इस क्षेत्र को मिसिओनेस के नाम से जाना जाता है। अर्जेंटीना को दुनिया में सर्वाधिक प्राकृतिक सौन्दर्य वाला देश माना जाता है। इन प्राकृतिक सौन्दर्य में झरनों की यह श्रंखला भी है। इग्वाजू नदी का यह झरना श्रंखला विश्व में प्रसिद्ध है।
    अर्जेंटीना ने इस क्षेत्र को राष्टीय उद्यान क्षेत्र घोषित किया है। अर्जेंटीना का सौन्दर्य से परिपूरित यह क्षेत्र करीब बीस किलोमीटर के दायरे में है जबकि झरना श्रंखला करीब तीन किलोमीटर दायरे में है। इग्वाजू नदी करीब 1200 किलोमीटर की यात्रा तय करती है। इसका उद्भव ब्राजील से है तो अर्जेंटीना में इसकी खूबसूरती दिखती है। नदी की इस यात्रा में पठार श्रंखला की समृद्धता दिखती है। 
    बलुआ पत्थर श्रंखला की इस क्षेत्र में बहुलता है। झरना एवं नदी क्षेत्र में परतों एवं दरारों की श्रंखला दिखती है। यह प्राकृतिक सौन्दर्य का अद्भूत दृश्य होता है। भौगोलिक दशा ऐसी है कि झरना एवं नदी के जल प्रवाह से भीषण एवं भयंकर गर्जना सुनाई देती है।
      ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे कोई राक्षस गर्जना कर रहा हो। किवदंती है कि इस नदी में बोई नाम का सांप रहता है। यह सांप नित्य वर्ष आदिवासी समुदाय से एक आैरत की बलि लेता था। जिससे एक भय भी था। एक बार एक बहादुर महिला गुआरानी अबोरीगिन ने इस मिथक को तोड़ दिया। गुआरानी ने नदी से संघर्ष कर खुद को बचा लिया। वस्तुत: जल प्रवाह में महिला का बलिदान हो जाता था।
   सौन्दर्य बोध को रेखांकित करने वाला झरना श्रंखला चांद की खूूबसूरती का अवलोकन कराता है। झरना श्रंखला के बीच चांद ऐसे दिखता है, जैसे चांद झरनों के साथ चल रहा है। झरना श्रंखला को देखने के लिए नदी के उपर एक शानदार पुल भी बना है।
  जिससे पर्यटक-दर्शक झरनों को आैर अधिक निकट जाकर सौन्दर्य का आनन्द ले सकते है। पर्यटन की दृष्टि आवागमन के संसाधन विकसित किये गये हैं।

Tuesday, 17 October 2017

कुलधरा : विलक्षण गांव, फिर बस नहीं सका

    देश-दुनिया में अद्भुत विलक्षण संरचनाओं की कहीं कोई कमी नहीं। श्राप ने हिन्दुस्तान के एक गांव की दशा-दिशा बदल दी तो गांव पुरातत्व विभाग की सम्पत्ति बन गया तो वहीं विलक्षणता से देश-दुनिया के विशेषज्ञ आश्चर्यचकित हैं। 

    जी हां, आश्चर्य यह कि आखिर कुछ ही पलों में पांच हजार से अधिक परिवारों की आबादी कहां लुप्त हो गयी। राजस्थान के जैसलमेर से करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर गांव कुलधरा है। इस विलक्षण गांव से रात में अचानक आबादी गायब-लुप्त हो गयी। आखिर इस गांव की आबादी कहां गयी, किसी को कुछ भी पता नहीं।
     राजस्थान के कुलधरा गांव में आज भी छह सौ से अधिक घर-घरौंदे अस्तित्व में दिखते हैं लेकिन सब कुछ विरान है। विशेषज्ञों की मानें तो सालों साल  से यह गांव विरान पड़ा है। मूलत: यह गांव राजस्थान के पालीवाल ब्रााह्मण परिवारों का है। कभी आर्थिक सम्पन्नता से भरपूर अब मरघट जैसी दशा में है।
    विशेषज्ञों की मानें तो कुलीन ब्रााह्मण परिवारों ने जैसलमेर आैर आसपास के इलाकों में चौरासी गांव विकसित किये। यह विकास पांच सौ वर्ष में किया गया। जैसलमेर रियासत के दीवान सालिम सिंह के अत्याचार-उत्पीड़न के विरोध में बाशिंदों ने गांव से पलायन किया। पालीवाल परिवारों पर कर एवं लगान की बेइंतहां बढ़ोत्तरी की गयी। जिससे खेती व व्यापार सब कुछ चौपट हो गया।
    पालीवाल समुदाय दीवान के अत्याचारों से अति दुखी था। हद तो तब हो गयी, जब दीवान ने पालीवाल समुदाय की एक युवती को हासिल करना चाहा। बस इसके बाद समुदाय ने विरोध कर दिया। पालीवाल समुदाय ने तय किया कि सम्मान व इज्जत पर चोट बर्दास्त नहीं। अन्तोगत्वा, गांव कुलधरा के बाशिंदों ने रात में अचानक गांव खाली कर दिया। साथ ही श्राप भी दिया कि अब इस गांव में कोई बस नहीं पायेगा। गांव छोड़ने से पहले कोठारी गांव में पंचायत की।
    निर्णय के मुताबिक पालीवाल समुदाय ने गांव खाली कर दिया। आश्चर्य यह कि कुलधरा गांव का बाशिंदा पालीवाल समुदाय आखिर कहां गया क्योंकि गांव से पलायन के बाद समुदाय का कहीं कोई अता-पता नहीं चला। विशेषज्ञों की मानें तो इन गांव को भले ही सात सौ-आठ सौ साल पहले बसाया गया हो लेकिन गांव का निर्माण वैज्ञानिक तौर-तरीके से किया गया था क्योंकि राजस्थान में जहां एक ओर रेगिस्तान की तपिश महसूस की जाती है वहीं इस गांव के घरों में शीतलता का अनुभव होता है।
    घरों के भीतर पानी के कुण्ड-कुंआ, ताक-चाक आैर सीढ़ियां बेहतरीन हैं। घरों की बनावट ऐसी कि हवा चले तो बांसुरी की तान सुनाई दे। घरों में शीतलता का अनुभव। राजस्थान के रेगिस्तान में खेती का होना, पालीवाल समुदाय की समृद्धि का रहस्य रहा। आखिर रेगिस्तान में खेती कैसे होती थी ? विशेषज्ञों की मानें तो पालीवाल समुदाय के अचानक पलायन के बाद आसपास के बाशिंदों ने गांव में बसने की कोशिश की लेकिन कोई कामयाब नहीं हो सका। 
    श्राप का दुष्प्रभाव आज भी दिखता है। कुलघरा गांव एक अवशेष के तौर पर आज भी देखा जा सकता है। विलक्षणता को देखने देश-विदेश के पर्यटक बड़ी संख्या में आते है। यह गांव अब पुरातात्विक विभाग संरक्षित है।

Monday, 16 October 2017

फायरफॉल : प्राकृतिक करिश्मा

   देश-दुनिया में करिश्मा-चमत्कारों की कहीं कोई कमी नहीं। करिश्मा-चमत्कार को प्राकृतिक आभा का उद्भव कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

    कल्पना करें कि किसी पहाड़ के झरना से पानी के स्थान पर आग का प्रवाह हो रहा हो तो शायद काफी कुछ अचरज सा लगेगा लेकिन इस दुनिया में ऐसा भी है। पहाड़ से आग का झरना देख कर कहीं अचरज होगा तो वहीं दहशत भी दिखेगी। 
    अमरीका के कैलिफोर्निया स्थित केयोजमाइट राष्ट्रीय उद्यान में पहाड से गिरने वाला झरना देख कर कहीं न कहीं सहम जायेंगे लेकिन इस अद्भूत झरना की एक झलक पाने के लिए लाखों पर्यटक अमेरिका आते-जाते हैं। 
     इसे आग उगलने वाले पहाड को 'फायरफॉल" के नाम से जाना-पहचाना जाता है। इस राष्ट्रीय उद्यान से करीब दो हजार फुट की ऊंचाई वाला यह पहाड सौन्दर्य का अनुपम उदाहरण बना है। वस्तुत: यह पहाड आग नहीं उगलता बल्कि आग उगलने का करिश्मा रोशनी का करिश्मा है। 
     सूरज की रोशनी से ऐसा आभास होता है कि पहाड से निकलने वाला पानी नहीं आग का झरना है। इसके सौन्दर्य का सहज आंकलन इसी से किया जा सकता है कि वर्ष 1952 में हालीवुड फिल्म 'दि केन मुटिनी" की शूटिंग इस विलक्षण स्थल पर की गयी थी। 
    इसमें इस अद्भूत झरना को दृश्यावलोकित किया गया। दिलचस्प यह रहा कि यह पहाड एक होटल के शीर्ष पर है। वर्ष 1870 में होटल का मालिक अपने विजिटर के साथ आया था। पहाड-झरना का करिश्मा देख कर स्थल को पर्यटन का स्वरुप दे दिया। 
     हालात यह हैं कि देश-दुनिया से साल में 3.50 मिलियन से अधिक पर्यटक इस आग उगलते झरना को देखने आते हैं। 'फायरफॉल" के इस झरना पर वस्तुत: सूरज की रोशनी पहाड से टकरा कर पड़ती है। पहाड से टकरा कर आने वाली रोशनी झरना के पानी के रंग को आग के रंग में बदल देती है। 
   शाम करीब 5.30 बजे इस स्थल पर अद्भूत नजारा उत्पन्न होता है। यह एक चमत्कारी परिवर्तन होता है। विश्व के आकर्षण वाले राष्ट्रीय उद्यानों में इसे एक माना जाता है। पर्यटकों की आवाजाही निरन्तर बनी रहती है।

Sunday, 15 October 2017

कासा बाटलो : कहीं हड्डियां तो कहीं खोपड़ी

    इच्छाशक्ति हो तो क्या नहीं हो सकता ! जी हां, बस कुछ नया या अनूठा करने की इच्छा हो तो निश्चित नया आयाम विकसित होगा।


  देश-दुनिया में असंख्य अजूबा या विस्मय हैं। स्पेन के बार्सिलोना में सनक या इच्छाशक्ति ने एक ऐसा महल बना डाला जिसे देखने के लिए दुनिया भर पर्यटक-बाशिंदे आते हैं।  इस खास महल 'कासा बाटलो" को देखने या घूमने के लिए 'ऑनलाइन" एण्ट्री टिकट भी बुक कराये जा सकते हैं। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि 'कासा बाटलो" दुनिया का खास एवं अद्भूत महल है।
     महल 'कासा बाटलो" वैसे तो बना पत्थर, मोजेक एवं बालू के सम्मिश्रण से है लेकिन ऐसा एहसास होता है कि इसमें हड्डियों का उपयोग किया गया है। आकार-प्रकार एवं महल की संरचना हड्डियों पर आधारित दिखती है लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। बार्सिलोना के इस महल की अद्भूत डिजाइन इसे कुछ खास बनाती है। महल 'कासा बाटलो" को मशहूर वास्तुकार एंटोनी गौड़ी ने डिजाइन किया।
   वास्तुकार एंटनी गौड़ी को खास तौर से अलंकरण, गुफाओं की संरचना एवं प्राकृतिक परिस्थितियों की संरचना के लिए जाना जाता है। इस खूबसूरत महल का स्वामित्व जोसेप बाटलो एवं कासा बाटलो के पास है। इसे जोसफ बाटलो हाउस भी कहा जाता है। महल को करीब एक सौ पन्द्रह साल पहले 1900 में खरीदा गया।
    नव-डिजाइन व नव-निर्माण को ध्यान में रख कर इसे ध्वस्त कर दिया गया। वास्तुकार एंटोनी गौडी़ की डिजाइन के आधार पर इसका निर्माण किया गया। इसमें रंगीन स्तरित बालू, खास किस्म के पत्थर, मोजैक, सेरेमिक टाइल्स आदि का उपयोग किया गया।
    दिलचस्प विशेषता यह है कि बालकनी, कक्ष, खम्भे सहित सभी कुछ हड्डियों के आकार-प्रकार एवं सरंचना आधारित हैं। महल को गौर से देखें तो खोपड़ी नुमा ढ़ांचा दिखता है। ऐसा प्रतीत होता है कि बालकनी की कैनोपी इंसानी खोपड़ी है। कांच की खिड़कियां भी खास डिजाइन हैं। 
     इंटीरियर भी हड्डियों का आभास कराता है। एंटोनी ने इसे 1904 में डिजाइन किया लेकिन इसके निर्माण में कई वर्ष लग गये। महल की आकृति में कहीं चाकू का आभास होता है तो कहीं अजगर या तराजू दिखता है। खास तौर से अब इस शानदार एवं खास महल का संग्रहालय के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है। 
     वास्तुकला का यह महल एक शानदार उदाहरण है। यहां प्रवेश के लिए पर्यटक को 18 यूरो बतौर शुल्क चुकाने होते हैं। बार्सिलोना में इस महल को 'कंकाल जैविक गुणवत्ता" का नमूना माना जाता है।
    अनियमित अण्डाकार खिड़कियां बताती हैं कि खास बनाने में कहीं कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गयी। बालकनी में खोपड़ी दिखती है तो खम्भों में हड्डियां साफ तौर पर नजर आती हैं।

टियाटिहुआकन : पिरामिड श्रंखला का शहर     'रहस्य एवं रोमांच" की देश-दुनिया में कहीं कोई कमी नहीं। 'रहस्य" की अनसुलझी गु...